Ethanol Stove: नितिन गडकरी ने लॉन्च किया LPG का सस्ता विकल्प? 

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Ethanol Stove: नितिन गडकरी ने लॉन्च किया LPG का सस्ता विकल्प? 

LPG की किल्लत के बीच नितिन गडकरी ने लॉन्च किया Ethanol-Based Stove Technology. जानिए कैसे ये सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प आपकी रसोई बदल सकता है।

नागपुर 26 May । देश के कई हिस्सों से रसोई गैस (LPG) की किल्लत की खबरों के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने एक बड़ा विकल्प पेश किया है। होर्मुज मार्ग पर भू-राजनीतिक तनाव के चलते एलपीजी आयात पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, ठीक उसी समय गडकरी ने नागपुर में एक नई Ethanol-Based Stove Technology का अनावरण किया। सरकार का दावा है कि यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि पूरी तरह से स्वदेशी और पर्यावरण के अनुकूल भी है।

क्या है यह नई तकनीक?

गडकरी ने इस स्टोव को ‘गेम चेंजर’ बताते हुए कहा कि यह पारंपरिक एलपीजी सिलेंडर या मिट्टी के तेल से बिल्कुल अलग है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह स्टोव शुद्ध इथेनॉल पर नहीं, बल्कि इथेनॉल में पानी मिलाकर काम करता है। यह मिश्रण एक स्वच्छ नीली लौ पैदा करता है, जिससे खाना पकाने में कोई परेशानी नहीं होती।

यह तकनीक पूरी तरह से भारतीय है और इसे बढ़ते बायोफ्यूल मिशन के तहत एक मील के पत्थर के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक तरफ सरकार 2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को पार कर चुकी है, वहीं अब फोकस खाना पकाने के ईंधन पर है।

क्या एलपीजी से सस्ता है यह विकल्प?

मौजूदा समय में जब कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतें आसमान छू रही हैं, गडकरी का दावा काफी अहम है। उनके अनुसार, Ethanol-Based Stove Technology का उपयोग करने पर खाना पकाने का खर्च पारंपरिक एलपीजी सिलेंडरों की तुलना में काफी कम आएगा।

  • आर्थिक फायदा: चूंकि इथेनॉल गन्ने और मक्का जैसी फसलों से बनता है, इसलिए इसका उत्पादन घरेलू स्तर पर किया जा सकता है। इससे आयात बिल में भारी कमी आएगी। भारत अपनी LPG जरूरतों का 85% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इथेनॉल के इस्तेमाल से हर साल लाखों करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
  • किसानों को फायदा: इस तकनीक के आने से गन्ना और मक्का उत्पादक किसानों की आय दोगुनी हो सकती है। फसलों की अतिरिक्त पैदावार अब सीधे ईंधन में बदलेगी।

पर्यावरण के लिहाज से कितना सुरक्षित?

पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी, कोयला या केरोसिन के मुकाबले इथेनॉल पूरी तरह से स्वच्छ ईंधन है। इसके जलने पर कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और बिना जले हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन न के बराबर होता है।

यह उन ग्रामीण महिलाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है, जो अब भी चूल्हे पर लकड़ी जलाती हैं। इससे होने वाले धुएं से हर साल लाखों लोग फेफड़ों की बीमारियों का शिकार होते हैं। इथेनॉल स्टोव से घर के अंदर की हवा पूरी तरह शुद्ध रहेगी।

चुनौतियां: क्या होगा सुरक्षा का ख्याल?

हालांकि यह तकनीक क्रांतिकारी है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां भी हैं। इथेनॉल एक अत्यधिक ज्वलनशील तरल पदार्थ है। घरों के अंदर इसका उपयोग करने के लिए अत्यधिक सख्त सुरक्षा मानकों की आवश्यकता होगी।

  • भंडारण: एलपीजी की तरह इसे सिलेंडर में रखना आसान नहीं है। तरल ईंधन के लिए विशेष कंटेनर और लीकेज प्रूफ व्यवस्था चाहिए।
  • जन जागरूकता: आम उपभोक्ता को यह समझाना होगा कि आग लगने की स्थिति में कैसे निपटा जाए।
  • आपूर्ति श्रृंखला: फिलहाल ठाणे जैसे शहरों में ड्रम पैकेजिंग में ₹55 प्रति किलो की दर से इथेनॉल उपलब्ध है, लेकिन इसे हर गांव और शहर तक पहुंचाने के लिए एक मजबूत वितरण तंत्र बनाना होगा।

क्या यह तकनीक मौजूदा एलपीजी संकट का हल है?

फिलहाल, सरकार का स्पष्ट रुख है कि देश में रसोई गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन होर्मुज मार्ग पर बाधा ने भविष्य में आयात पर निर्भरता खतरनाक साबित हो सकती है। ऐसे में Ethanol-Based Stove Technology दीर्घकालिक समाधान के तौर पर उभर कर सामने आ रही है।

यह तकनीक भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस तकनीक को जमीनी स्तर पर कितनी जल्दी और प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है। अगर यह सफल रही, तो आने वाले वर्षों में भारतीय रसोई का चूल्हा एलपीजी से एथेनॉल की ओर शिफ्ट हो सकता है।

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