Bada Mangal क्यों मनाया जाता है? लखनऊ के नवाबों से जुड़ी अनसुनी कहानी”

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Bada Mangal क्यों मनाया जाता है? लखनऊ के नवाबों से जुड़ी अनसुनी कहानी”

जानिए Bada Mangal की शुरुआत कैसे हुई? नवाब शुजा-उद-दौला की बेगम से लेकर वाजिद अली शाह तक, हनुमान भक्ति और भंडारे की अनोखी कहानी।

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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहचान सिर्फ नवाबी अंदाज और कबाबों तक सीमित नहीं है। यह वह शहर है जहाँ सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल ‘ज्येष्ठ के बड़े मंगल’ के रूप में देखने को मिलती है। जहाँ एक ओर केसरी नंदन हनुमान ने संजीवनी पर्वत उठाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए, वहीं लखनऊ के नवाबों ने अपनी आस्था और मन्नतों के चलते Bada Mangal history tradition को जन्म दिया। यह परंपरा करीब 250-300 साल पुरानी है और इसके पीछे एक से बढ़कर एक दिलचस्प किस्से मौजूद हैं।

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, अवध के नवाब हमेशा से ही गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक रहे हैं। बड़े मंगल के दिन (ज्येष्ठ मास के मंगलवार) होने वाले विशाल भंडारे और लंगर की शुरुआत किसी एक नहीं, बल्कि दो-तीन अलग-अलग ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी है। आइए, इन दो प्रमुख कहानियों को विस्तार से समझते हैं।

Bada Mangal history tradition 

पहली कहानी: संतान सुख के लिए नवाब की बेगम ने की थी प्रार्थना
Bada Mangal history tradition की सबसे पुरानी कथा अवध के शक्तिशाली नवाब शुजा-उद-दौला की पत्नी जनाब-ए-आलिया से जुड़ी है। बताया जाता है कि जनाब-ए-आलिया जन्म से आस्थावान हिंदू थीं और उनका विवाह नवाब से हुआ था। उनके मन में हनुमान जी के प्रति अपार श्रद्धा थी। कहते हैं कि संतान सुख की प्रबल इच्छा के चलते जनाब-ए-आलिया ने लखनऊ के पुराने हनुमान मंदिर (अलीगंज स्थित प्राचीन मंदिर) में जाकर मन्नत मांगी।

उनकी मन्नत पूरी हुई और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। इस चमत्कार के बाद, कृतज्ञता स्वरूप जनाब-ए-आलिया ने उस जीर्ण-शीर्ण मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और एक नए मंदिर का निर्माण कराया। यह पुण्य कार्य ज्येष्ठ माह के मंगलवार के दिन पूरा हुआ। इसी उपलक्ष्य में उन्होंने प्रसाद वितरण की शुरुआत की। इतिहासकार मानते हैं कि यहीं से बड़े मंगल पर भंडारे की जड़ें जुड़ती हैं।

दूसरी कहानी: शहजादे की जान बचाने वाला चमत्कार
दूसरी और अधिक प्रचलित कथा नवाब वाजिद अली शाह से जुड़ी है, जिसका जिक्र ऊपर भी किया गया है। हालांकि, इसी तरह की एक और किंवदंती नवाब सआदत अली खान के समय की है, जो Bada Mangal history tradition को और मजबूती देती है।

ऐसा कहा जाता है कि नवाब सआदत अली खान के बेटे मोहम्मद अली शाह (जो बाद में नवाब बने) गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। हकीमों और वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिए। हर इलाज नाकाम होता जा रहा था। तब नवाब को अलीगंज स्थित हनुमान मंदिर के बारे में बताया गया। अपनी संतान की जान बचाने के लिए नवाब सआदत अली खान मंदिर पहुंचे और उन्होंने हनुमान जी से प्रार्थना की।

चमत्कारी रूप से शहजादे की सेहत में सुधार होना शुरू हो गया। इस चमत्कार के बाद नवाब ने मन्नत मानी कि वह हर साल ज्येष्ठ माह के मंगलवार को विशाल भंडारे का आयोजन करेंगे। बाद में जब वाजिद अली शाह के बेटे की तबीयत खराब हुई, तो उन्होंने भी यही परंपरा निभाई और मंदिर का पुनर्निर्माण करवाकर गुड़ का प्रसाद बांटा।

ऐसे बना बड़े मंगल का स्वरूप
इन घटनाओं के बाद धीरे-धीरे लखनऊ में ज्येष्ठ माह के प्रत्येक मंगलवार को ‘बड़े मंगल’ के रूप में मनाने की परंपरा विकसित हुई। Bada Mangal history tradition के केंद्र में अलीगंज का प्राचीन हनुमान मंदिर है, लेकिन आज पूरे लखनऊ में इस दिन सैकड़ों भंडारे लगते हैं।

खास बात यह है कि यह परंपरा किसी एक धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं रही। नवाबों ने इसकी शुरुआत की, तो आम जनता ने इसे अपना लिया। आज बड़े मंगल के दिन न सिर्फ हिंदू, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी भंडारों में शामिल होते हैं और लंगर में योगदान करते हैं।

क्या है आज का स्वरूप?
करीब 200 से 300 साल पहले शुरू हुई यह परंपरा आज और भी व्यापक हो गई है। लखनऊ में ज्येष्ठ मंगल के दिन अलीगंज, आलमबाग, चौक, अमीनाबाद सहित हर मोहल्ले में हनुमान चालीसा के जयकारे लगते हैं। सुबह से ही मंदिरों में विशेष रुद्राभिषेक और सिंदूर चढ़ाने की परंपरा है।

लोग ‘गुड़ चना’, ‘पूड़ी-सब्जी’ और ‘खीर’ के भंडारे लगाते हैं। कई जगहों पर रात भर के कीर्तन और रामायण के पाठ का आयोजन किया जाता है। Bada Mangal history tradition सिखाती है कि सच्ची भक्ति जाति या धर्म नहीं देखती। नवाबों ने जिस आस्था के साथ हनुमान जी के दरबार में माथा टेका, वही भावना आज भी लाखों लोगों में देखने को मिलती है।


इतिहास गवाह है कि Bada Mangal history tradition केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है। यह लखनऊ की उस सांस्कृतिक एकता (Ganga-Jamuni Tehzeeb) की जीती-जागती मिसाल है, जहाँ एक ओर नवाब शुजा-उद-दौला की बेगम जनाब-ए-आलिया ने मंदिर बनवाया, तो दूसरी ओर वाजिद अली शाह ने गुड़ बांटी। आज यह परंपरा सौहार्द और संकटमोचन भक्ति का प्रतीक बन चुकी है। इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा लगभग 200 साल से अधिक पुरानी है और आने वाली सदियों तक इसी उत्साह के साथ मनाई जाती रहेगी।


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