73 वर्षीय Sushila Karki बनीं नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री !

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नेपाल में Sushila Karki देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जानें उनकी न्यायिक यात्रा, चुनौतियों और अंतरिम सरकार के एजेंडे के बारे में।

काठमांडू।12 Sep: नेपाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला है, जहाँ सुशीला कार्की देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में उभरी हैं। हिंसक विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों और युवा प्रदर्शनकारी समूहों के बीच उनके नाम पर आम सहमति बनने के बाद यह फैसला लिया गया। 73 वर्षीय कार्की ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सहित कैबिनेट के इस्तीफे के बाद खाली हुए पद को भरा है।

राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने एक संक्षिप्त और गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति भवन में सुशीला कार्की को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस ऐतिहासिक अवसर पर उपराष्ट्रपति राम सहाय यादव और प्रधान न्यायाधीश प्रकाश मान सिंह रावत भी मौजूद रहे। राष्ट्रपति पौडेल ने कहा कि नई अंतरिम सरकार का प्राथमिक दायित्व अगले छह महीनों के भीतर स्वतंत्र और निष्पक्ष संसदीय चुनाव कराना सुनिश्चित करना होगा।

सुशीला कार्की: न्यायपालिका से सत्ता के शिखर तक का सफर

सुशीला कार्की का जन्म 7 जून, 1952 को नेपाल के बिराटनगर में हुआ था। उन्होंने 1972 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और 1975 में भारत के प्रतिष्ठित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद, 1978 में उन्होंने त्रिभुवन विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल करने के बाद 1979 में बिराटनगर में वकालत शुरू की।

उनकी न्यायिक यात्रा शानदार रही है। वर्ष 2009 में, उन्हें नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में एक अस्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया, और 2010 में वह एक स्थायी न्यायाधीश बन गईं। उनका सबसे उल्लेखनीय योगदान तब सामने आया जब वह 2016 में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और बाद में 11 जुलाई, 2016 से 6 जून, 2017 तक नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनीं।

सत्ता से टक्कर और एक साहसिक प्रतीक के रूप में उभरना

कार्की का कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। अप्रैल 2017 में, तत्कालीन सरकार ने उनके खिलाफ संसद में एक महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसके बाद उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद से निलंबित कर दिया गया। हालाँकि, यह कदम जनता और न्यायिक हलकों में व्यापक रूप से अलोकप्रिय साबित हुआ। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए देश भर में आवाज़ें उठीं। सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और संसद को आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी। जनता के दबाव और न्यायालय के फैसले के कारण, संसद को महज कुछ ही दिनों में प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

इस घटना ने सुशीला कार्की की छवि एक ऐसे मजबूत और निडर न्यायिक व्यक्तित्व के रूप में गढ़ी, जो सत्ता के दबाव में झुकने से इनकार करती हैं। यही गुण उन्हें वर्तमान राजनीतिक संकट को सुलझाने और सभी पक्षों के बीच विश्वास बहाल करने के लिए एक आदर्श उम्मीदवार बनाते हैं।

आगे की चुनौतियाँ

अपने अंतरिम कार्यकाल में, प्रधानमंत्री कार्की के सामने कई चुनौतियाँ हैं। उनकी सरकार को न केवल देश में शांति और स्थिरता बहाल करनी होगी, बल्कि युवा प्रदर्शनकारियों की मांगों को भी ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की प्रक्रिया को सुनिश्चित करना होगा। एक अनुभवी न्यायाधीश और इतिहास रचने वाली नेता के रूप में, पूरा देश उम्मीद भरी नज़रों से देख रहा है कि सुशीला कार्की नेपाल को इस राजनीतिक गतिरोध से बाहर निकालने में सक्षम होंगी।

नेपाल के जन आंदोलन की मांग: 73 वर्षीय सुशीला कार्की (Sushila Karki) बनें अंतरिम प्रधानमंत्री


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