Iran Protests: 12,000 का कत्लेआम , जर्मनी ने कहा – सरकार का आखिरी समय

Iran Protests: 12,000 का कत्लेआम , जर्मन चांसलर ने की सरकार गिरने की भविष्यवाणी। ईरान ने माना 2000 मौत, मीडिया ने आरोप लगाया 12,000 हत्या का। #IranProtests
पिछले दो सप्ताह से ईरान में छिड़े व्यापक विरोध प्रदर्शनों ने एक भयावह और नाटकीय मोड़ ले लिया है। एक ओर जहाँ तेहरान प्रशासन ने पहली बार माना है कि इन झड़पों में लगभग दो हज़ार लोगों, जिनमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं, की मौत हुई है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठन इस आँकड़े को कहीं अधिक विकट बता रहे हैं। यह विरोध देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिबंधों के विरोध में उठ खड़ा हुआ है।
Iran protests
ईरान इंटरनेशनल’ द्वारा प्रकाशित एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, केवल 8 और 9 जनवरी, 2026 की दो रातों में ही लगभग 12,000 प्रदर्शनकारियों को निर्ममता पूर्वक मार दिया गया। इस खबर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में तूफान ला दिया है और विश्व नेताओं से तीखी प्रतिक्रिया दर्ज करवाई है। ईरानी सरकार ने इन आरोपों का जोरदार खंडन किया है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने रॉयटर्स को दिए साक्षात्कार में दावा किया कि ये मौतें “प्रदर्शनकारियों के भेष में आए आतंकवादियों” की कारस्तानी हैं, जो सुरक्षा बलों और निर्दोष नागरिकों को निशाना बना रहे थे।
हालाँकि, इस सफाई पर बहुत कम लोग यकीन करते दिख रहे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता शिरीन एबादी ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उसने इंटरनेट सेवाएँ बंद कर और मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर एक “सुनियोजित नरसंहार” को अंजाम दिया है, ताकि वास्तविकता को दुनिया की नज़रों से छुपाया जा सके।
इस संकट पर एक बड़ी और सीधी टिप्पणी जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज की ओर से आई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि, “हम ईरान में इस शासन के अंतिम दिन और सप्ताह देख रहे हैं। कोई भी सरकार जो केवल हिंसा और दमन के बल पर टिकी हो, उसका पतन निश्चित है।” चांसलर मेर्ज का यह बयान पश्चिमी देशों के बीच ईरान की स्थिति को लेकर बढ़ती चिंता और कड़े रुख को दर्शाता है।
ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस टिप्पणी को तत्काल खारिज कर दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराक्ची ने इसे “दोहरे मापदंड” का उदाहरण बताया और कहा कि जर्मनी जैसे देशों को दूसरे राष्ट्रों को सबक सिखाने के बजाय अपने घरेलू मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने ईरानी अधिकारियों द्वारा प्रदर्शनकारियों को ‘आतंकवादी’ करार दिए जाने की कड़ी निंदा की है। उन्होंने हिंसा को तत्काल रोकने और संवाद का मार्ग अपनाने की अपील की है। यूरोपीय देशों का रवैया भी सख्त है; नीदरलैंड्स, स्पेन और फ़िनलैंड जैसे राष्ट्रों ने ईरानी राजदूतों को तलब कर अपनी आपत्ति और चिंता का आधिकारिक रूप से संज्ञान लिया है।
वर्तमान में ईरानी सरकार का रुख द्वंद्वात्मक प्रतीत होता है। एक तरफ तो वह प्रदर्शनों को “कानून के दायरे में नागरिक अधिकार” मानने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा बलों द्वारा बड़े पैमाने पर बल प्रयोग की खबरें लगातार आ रही हैं। ईरानी विदेश मंत्री ने हाल में दिए एक भाषण में कहा कि सरकार “शांतिपूर्ण समाधान के लिए वार्ता” के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही यह चेतावनी भी दी कि “यदि युद्ध थोपा गया, तो हम उसके लिए भी पूर्णतः सज्ज हैं।”
यह टकराव ईरान के भीतर एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बीच, ईरानी प्रशासन के सामने अपनी जनता के विश्वास को पुनः प्राप्त करने की बड़ी चुनौती है। आने वाले दिन यह निर्धारित करेंगे कि देश शांति और संवाद के रास्ते पर चलता है या फिर हिंसा का यह दौर और भी गहरा हो जाता है।
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