Congress नहीं Netaji और INA का वह डर, जिसने अंग्रेजों को भगाया: गुप्त फाइलों से खुलासा

जानिए कैसे Netaji बोस की INA ने अंग्रेजों की नींव हिला दी थी। गुप्त फाइलों और ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली के बयान से खुलासा।
भारत की आज़ादी का श्रेय अक्सर अहिंसक आंदोलनों को दिया जाता है, लेकिन इतिहास के कुछ पन्ने यह सवाल उठाते हैं कि क्या सच में केवल इन आंदोलनों के दबाव में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा? क्या यह विशुद्ध रूप से ब्रिटिश सद्भावना थी? नेताजी (Netaji) सुभाष चंद्र बोस पर लेखक किंशुक नाग की किताब और तमाम ऐतिहासिक दस्तावेज़ एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। यह कहानी है इंडियन नेशनल आर्मी (INA ) द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य की बुनियाद में दरार पैदा करने और उनके मन में एक अदृश्य डर बैठा देने की।
वह गुप्त अलमारी और “भारतीयों के लिए नहीं” वाली फाइलें
अगस्त 1946 की बात है। लेफ्टिनेंट जनरल एस. के. सिन्हा (बाद में जम्मू-कश्मीर और असम के राज्यपाल) ब्रिटिश भारतीय सेना के उन तीन भारतीय अधिकारियों में थे, जिन्हें सैन्य संचालन निदेशालय (एम.ओ.डी.) में तैनात किया गया था। उनके पूर्ववर्ती एक अंग्रेज अधिकारी थे, जो जल्दी से भारत छोड़कर जाना चाहते थे। हड़बड़ाहट में, उन्होंने सिन्हा को एक ‘टॉप सीक्रेट’ अलमारी की चाबी सौंप दी। उस अलमारी के भीतर दो फाइलें थीं, जिन पर हैरतअंगेज शब्द लिखे थे – “टॉप सीक्रेट नॉट फॉर इंडियन आइज” (यानी, भारतीयों के लिए नहीं)।
पहली फाइल में ब्रिटिश भारतीय सेना में भारतीय अधिकारियों की ‘वफादारी’ पर एक चिंताजनक रिपोर्ट थी। इसमें बताया गया था कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय अधिकारियों की संख्या मात्र 450 से बढ़कर 12,000 हो गई थी और सिपाहियों की संख्या 1.5 लाख से 22 लाख। रिपोर्ट में इन अधिकारियों को तीन वर्गों में बांटा गया था और चेतावनी दी गई थी कि तीसरे वर्ग (युद्धकालीन भर्ती) के अधिकारी “सबसे गैर-भरोसेमंद” हैं, जो स्वतंत्रता आंदोलन से प्रभावित थे और अपनी वफादारी बदल सकते थे।
दूसरी फाइल और भी डरावनी थी। इसका कोड नाम था ‘ऑपरेशन गोंडोला’। यह भारत में रह रहे लगभग 43,000 ब्रिटिश नागरिकों को आपातकाल में सुरक्षित निकालने की गुप्त योजना थी। साफ था कि ब्रिटिश सरकार को अपनी ही सेना के भारतीय सदस्यों पर भरोसा नहीं रह गया था और वे किसी बड़े विद्रोह की स्थिति में भागने की तैयारी कर चुके थे।
सवाल: यह डर पैदा किसने किया? जवाब: Netaji और INA
ब्रिटिश भारतीय सेना को जानबूझकर जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटकर रखा गया था, ताकि राष्ट्रवाद की भावना न पनप सके। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इस चाल को समझा और उलट दिया। उन्होंने आईएनए का गठन एक ऐसी राष्ट्रीय सेना INA के रूप में किया जहां सैनिक सबसे पहले भारत माता के प्रति वफादार थे।
आईएनए में सिख, राजपूत और मुसलमान सभी एक ही पलटन में थे, सभी एक ही रसोई में बना खाना खाते थे। उनका नारा था “जय हिंद”। नेताजी ने झांसी की रानी रेजिमेंट जैसी महिला बटालियन भी बनाई। यह दृष्टि अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के सीधे विपरीत थी। आईएनए ने जापान के साथ मिलकर इंफाल और कोहिमा की लड़ाई भी लड़ी, हालांकि ब्रिटिश सेंसरशिप ने यह खबर भारतीय जनता से छुपा ली।
लाल किले का मुकदमा: दमन की कोशिश, जनता का समर्थन
युद्ध समाप्त होने पर अंग्रेजों ने Netaji और INA के तीन अधिकारियों – एक हिंदू (पी.के. सहगल), एक मुस्लिम (शाहनवाज खान) और एक सिख (जी.एस. ढिल्लों) पर लाल किले में राजद्रोह का मुकदमा चलाया। उन्हें लगा कि जनता INA के ‘गद्दारों’ से नफरत करेगी। लेकिन हुआ उल्टा। पूरा देश इन वीरों के पक्ष में खड़ा हो गया। जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने भी उनकी वकालत करने के लिए वकील का चोला पहन लिया। आईएनए की वीरता की कहानियों ने देश में एक नया गर्व और जोश भर दिया।
नौसेना का विद्रोह और अंतिम घंटी
INA मुकदमों का सबसे बड़ा प्रभाव फरवरी 1946 में देखने को मिला, जब रॉयल इंडियन नेवी के 10,000 से अधिक सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। इसके बाद वायुसेना और जबलपुर में सेना की इकाइयों में भी बगावत हुई। यह स्पष्ट संकेत था कि ब्रिटिश भारतीय सेना की निष्ठा अब औपनिवेशिक शासकों के साथ नहीं रह गई थी। अंग्रेजों को एहसास हो गया कि 1857 जैसा व्यापक सैन्य विद्रोह किसी भी क्षण भड़क सकता है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने भी माना: INA था मुख्य कारण
सबसे महत्वपूर्ण पुष्टि खुद ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लॉर्ड क्लेमेंट एटली ने 1956 में की। कलकत्ता में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने भारत छोड़ने के कारणों में सबसे महत्वपूर्ण कारण “नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आई.एन.ए. की गतिविधियों” और उससे प्रेरित रॉयल इंडियन नेवी के विद्रोह को बताया।
इतिहास का यह अध्याय साबित करता है कि भारत की आज़ादी सिर्फ एक तरह के आंदोलन का परिणाम नहीं थी। यह अहिंसक संघर्ष और सशस्त्र देशभक्ति के संयोग से मिली विजय थी। नेताजी बोस और आईएनए के वीर सैनिकों ने अंग्रेजों के मन में वह डर पैदा किया कि अगर वे शांतिपूर्ण तरीके से नहीं गए, तो उन्हें बलपूर्वक बाहर निकाल दिया जाएगा। यह वह अनकहा दबाव था, जिसने अंग्रेजों को आनन-फानन में भारत छोड़ने और सत्ता हस्तांतरण के लिए मेज पर बैठने को मजबूर किया। आजादी की इस जटिल पहेली में आईएनए का योगदान एक स्वर्णिम, शौर्यपूर्ण और निर्णायक अध्याय है।
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