Sheetalashtaka Stotra : 2026 बसौड़ा पर्व पर पढ़ें यह पवित्र पाठ!

शीतला अष्टमी बसौड़ा पर्व पर शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ करें। जानें पूरे लिरिक्स, महत्व और लाभ। Sheetalashtaka Stotra हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व होली के बाद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शीतला माता रोगों की देवी हैं और उनकी कृपा से व्यक्ति समस्त शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों से मुक्ति पाता है।
शीतला अष्टमी यानी बसौड़ा पर्व के दिन Sheetalashtaka Stotra यानी शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं इस स्तोत्र का पाठ करने से शीतला माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है, जिससे शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। साथ ही घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्तोत्र त्वचा रोग निवारक और आरोग्यता प्रदान करने वाला माना गया है। चलिए आपको बताते हैं शीतलाष्टक स्तोत्र के लिरिक्स।
शीतलाष्टक स्तोत्र(Sheetalashtaka Stotra) का महत्व
स्कंद पुराण में वर्णित Sheetalashtaka Stotra भगवान शिव द्वारा रचित माना जाता है। इस स्तोत्र में कुल आठ मुख्य श्लोक हैं, जिनमें शीतला देवी का स्तवन किया गया है। देवी शीतला को गधे पर सवार, दिगम्बरा, हाथ में झाड़ू और कलश धारण किए हुए तथा सूप से अलंकृत मस्तक वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
यह स्तोत्र विशेष रूप से चेचक, दाद, खुजली, त्वचा विकार, ज्वर तथा अन्य संक्रामक रोगों से बचाव के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति इस Sheetalashtaka Stotra का नित्य पाठ करता है, उसके घर में कोई भी संक्रामक रोग प्रवेश नहीं करता।
शीतलाष्टक स्तोत्र: बसौड़ा पर्व पर करें इस पवित्र स्तोत्र का पाठ, मिलती है माता की विशेष कृपा
शीतलाष्टक स्तोत्र — सम्पूर्ण लिरिक्स
॥ विनियोग ॥
ऊँ अस्य श्रीशीतला स्तोत्रस्य महादेव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, शीतली देवता, लक्ष्मी बीजम्, भवानी शक्तिः, सर्वविस्फोटक निवृत्तये जपे विनियोगः ॥
ध्यान श्लोक
ध्यायामि शीतलां देवीं, रासभस्थां दिगम्बराम् । मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृत-मस्तकाम् ॥
ईश्वर उवाच — मुख्य अष्टक
श्लोक 1: वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् । मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम् ॥
श्लोक 2: वन्देऽहं शीतलां देवीं सर्वरोगभयापहाम् । यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटकभयं महत् ॥
श्लोक 3: शीतले शीतले चेति यो ब्रूयद्दाहपीडितः । विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति ॥
श्लोक 4: यस्त्वामुदकमध्ये तु ध्यात्वा सम्पूजयेन्नरः । विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥
श्लोक 5: शीतले ज्वरदग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च । प्रणष्टचक्षुषः पुंसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम् ॥
श्लोक 6: शीतले तनुजान् रोगान् नृणां हरसि दुस्त्यजान् । विस्फोटकविदीर्णानां त्वमेकाऽमृतवर्षिणी ॥
श्लोक 7: गलगण्डग्रहा रोगा येचान्ये दारुणा नृणाम् । त्वदनुध्यानमात्रेण शीतले यान्ति सङ्क्षयम् ॥
श्लोक 8: न मन्त्रो नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते । त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम् ॥
॥ फल श्रुति ॥
श्लोक 9: मृणालतन्तुसदृशीं नाभिहृन्मध्यसंस्थिताम् । यस्त्वां सञ्चिन्तयेद्देवि तस्य मृत्युर्न जायते ॥
श्लोक 10: अष्टकं शीतलादेव्या यो नरः प्रपठेत्सदा । विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ॥
श्लोक 11: श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धाभाक्तिसमन्वितैः । उपसर्गविनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत् ॥
श्लोक 12: शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता । शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ॥
पाठ विधि और विशेष निर्देश
Sheetalashtaka Stotra का पाठ करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर शीतला माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। प्रथम ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः मंत्र का 11 बार जाप करें। इसके पश्चात् श्रद्धापूर्वक स्तोत्र का पाठ करें।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति इस स्तोत्र को नियमित रूप से पढ़ता है, उसके घर में बच्चों को शीतला रोग नहीं होता। साथ ही परिवार में सुख, शांति और आरोग्य का वास रहता है।
शीतला माता का महात्म्य
शीतला माता को आयुर्वेद और लोक परंपरा दोनों में संक्रामक रोगों की देवी माना गया है। विशेष रूप से बच्चों की रक्षा के लिए माताएं इस Sheetalashtaka Stotra का पाठ विशेष उत्साह और आस्था के साथ करती हैं। माता शीतला की पूजा उत्तर भारत, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में विशेष रूप से प्रचलित है।
बसौड़ा पर्व पर इस Sheetalashtaka Stotra स्तोत्र का पाठ करना न केवल धार्मिक दृष्टि से फलदायी है, बल्कि यह परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करता है। इस शुभ अवसर पर शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ अवश्य करें और माता का आशीर्वाद प्राप्त करें।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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