Putrada Ekadashi 2025 : सही तिथि, पूजा विधि, महत्व और संतान प्राप्ति का व्रत- कथा !

Putrada Ekadashi जानें सही तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और इसके महत्व से जुड़ी पूरी जानकारी। संतान सुख पाने का पावन पर्व।
हिंदू धर्म में एकादशी के व्रतों का विशेष स्थान है। पौष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली पुत्रदा एकादशी इन्हीं में से एक अत्यंत फलदायी एवं मनोकामना पूर्ण करने वाला व्रत माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत का पालन करने से भक्तों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है तथा उनकी संतान दीर्घायु, स्वस्थ और सुखी रहती है। पूरे वर्ष में पड़ने वाली चौबीस एकादशियों में इसका अपना विशिष्ट महत्त्व है। हालाँकि, इस वर्ष तिथि-गणना को लेकर उत्पन्न भ्रम के कारण अनेक भक्तों के मन में यह प्रश्न है कि पुत्रदा एकादशी कब है? आइए, इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर और इस पावन व्रत की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें।
Putrada Ekadashi 2025: सही तिथि एवं मुहूर्त
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर पंडित सुभाष पांडेय के अनुसार, इस वर्ष पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi ) 30 दिसंबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के मुताबिक, पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 30 दिसंबर को तड़के 2 बजकर 51 मिनट से हो रही है। विशेष बात यह है कि यह तिथि सूर्योदय के समय ‘व्यापिनी’ है, अर्थात यह पूरे दिन रहेगी। ऐसी स्थिति में शैव और वैष्णव, दोनों ही सम्प्रदायों के लोग 30 दिसंबर को ही एकादशी (Putrada Ekadashi ) का व्रत रखेंगे और भगवान विष्णु की आराधना करेंगे। इस तिथि में भ्रम से बचने के लिए स्थानीय ज्योतिषीय मार्गदर्शन लेना हितकारी रहेगा।
व्रत का महत्व एवं पौराणिक आधार
Putrada Ekadashi का व्रत मुख्यतः संतान प्राप्ति और उसकी मंगल कामना के लिए किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के पालन से व्यक्ति के सभी अज्ञात पाप भी नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह व्रत केवल पुत्र इच्छा रखने वालों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी माता-पिता के लिए भी है जो अपनी संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। शास्त्रों में वर्णित विधि-विधान से किया गया यह व्रत भगवान विष्णु की असीम कृपा दिलाता है, जिससे जीवन की अनेक बाधाएँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं।
व्रत पूजन की सम्यक विधि
इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पवित्र भाव से पूजन प्रारंभ करना चाहिए।
- शालिग्राम पूजा: पुत्रदा एकादशी के दिन शालिग्राम (भगवान विष्णु का प्रतीक) की पूजा का विशेष विधान है। शालिग्राम को पहले पवित्र जल से स्नान कराएं।
- श्रृंगार: उन्हें चंदन का लेप लगाएं और तुलसी दल एवं कमल के पुष्प अर्पित कर श्रृंगारित करें।
- धूप-दीप: इसके बाद धूप, अगरबत्ती और घी का दीपक जलाकर विधिवत पूजा-आरती संपन्न करें।
- आह्वान एवं प्रार्थना: पूजा के समय मन ही मन भगवान विष्णु का आह्वान करें और अपनी मनोकामना का स्मरण करें।
- पारण: अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद उपवास का पारण करना चाहिए।
ऐसी मान्यता है कि इस विधि से पूजन करने पर भक्त को धन, ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीहरि उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं।
सामाजिक-आध्यात्मिक संदर्भ
एकादशी का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मानुशासन का एक श्रेष्ठ माध्यम भी है। पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi ) जैसे विशिष्ट व्रत सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं तथा पारिवारिक मूल्यों और संतान के प्रति दायित्वबोध को प्रगाढ़ करते हैं। यह पर्व हमें यह सीख देता है कि श्रद्धा, नियम और सद्भावना से किया गया कोई भी पुण्य कार्य अवश्य ही फलित होता है।
इस प्रकार, 30 दिसंबर 2025 को पड़ रही पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi 2025)का व्रत रखकर और उचित विधि से पूजन करके भक्त भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं तथा अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।

Putrada Ekadashi व्रत कथा :
पुत्रदा एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को पूजा के बाद श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा जरूर सुननी चाहिए, ऐसा करने से व्रत पूर्ण होता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अब आप शांतिपूर्वक इसकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वायपेयी यज्ञ का फल मिलता है।
द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था, कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं।
पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।
वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा: हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पुत्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है?
राजा महीजित की इस बात को विचारने के लिए मंत्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को देखते-फिरते रहे।
एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।
सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो।
लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले: हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।
उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।
यह वार्ता सुनकर ऋषि ने थोड़ी देर के लिए नेत्र बंद किए और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था।
एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्याह्न के समय वह जबकि वह दो दिन से भूखा-प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की ब्याही हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।
राजा ने उस प्यासी गाय को जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।
लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi )भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप अवश्य नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी।
लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत (Putrada Ekadashi ) और जागरण किया।
इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर उसके एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ।
इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा हासिल करने वाले इस व्रत को अवश्य करें। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।
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