Ultimate Guide! Pitru Paksh 2025: राम द्वारा दशरथ पिंडदान की भावनात्मक कथा, मातृ नवमी तिथि, विधि और महत्व

Pitru Paksh 2025 में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व है। जानिए मातृ नवमी की तिथि, विधि, महत्व और राम द्वारा दशरथ के पिंडदान की भावनात्मक कथा। पितरों की शांति और आशीर्वाद पाने के उपायों को विस्तार से पढ़ें।
लखनऊ 10 सितम्बर, 2025: पितृ (पितर) हमारे पूर्वज होते हैं — वे जो इस जगत को छोड़ चुके हैं लेकिन हमारे जीवन के साथ बंधे रहते हैं। हिंदू दर्शन में पितृों का स्थान बहुत विशेष है। माना जाता है कि मृतक की आत्मा को शांति देने, परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनाए रखने के लिए उनके प्रति कर्तव्य और श्रद्धा अनिवार्य है। यही भाव और परंपरा हर साल Pitru Paksh (पितृ पक्ष) के माध्यम से प्रकट होती है।
Pitru Paksh का उद्देश्य है — दिवंगत पूर्वजों को स्मरण करना, उनके लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करना ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। हिन्दू परंपरा में यह समय अत्यंत पवित्र माना जाता है — धार्मिक रीति-रिवाज़ों, उपायों और दान-पुण्यों का समय। इस साल पितृ पक्ष (Pitru Paksh) 2025 की शुरुआत 7 सितंबर से हुई है और इसका समापन 21 सितंबर को होगा।
Pitru Paksh 2025 — तारीखें और प्रमुख दिन
- शुरुआत: 7 सितंबर 2025 से।
- समापन: 21 सितंबर 2025 तक।
इस काल में सबसे महत्त्वपूर्ण तिथियों में से एक है मातृ नवमी (Matra Navami) — इस वर्ष मातृ नवमी का श्राद्ध 15 सितंबर, 2025 (सोमवार) को किया जाएगा।
मातृ नवमी के मुहूर्त (Matra Navami 2025 Muhurat):
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:51 से दोपहर 12:41 तक।
- रौहिणी मुहूर्त: दोपहर 12:41 से 01:30 तक।
- अपराह्न काल: दोपहर 01:30 से 03:58 तक।
मातृ नवमी विशेषतः उन माताओं के श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी मृत्यु नवमी तिथि को हुई हो अथवा जिनकी मृत्यु तिथि अज्ञात हो — इस दिन किया गया श्राद्ध उन स्त्रियों की आत्माओं के लिए शांति का कारण माना जाता है।
Pitru Paksh में किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठान (श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान) — विधि और नियम

Pitru Paksh में तीन प्रमुख कर्म होते हैं: तर्पण, पिंडदान (पिंड अर्पण) और श्राद्ध। इन कर्मों को करने की पारंपरिक विधि और नियम नीचे विस्तार से दिए जा रहे हैं:
1) स्नान और शुद्धता
- सुबह जल्दी उठकर शुद्ध स्नान करें।
- साफ वस्त्र धारण करें — पारंपरिक रूप से सफेद या हल्के रंग के वस्त्र श्रेयस्कर माने जाते हैं।
2) तर्पण (Tarpan) — विधि और सामग्री
- तर्पण के लिए आवश्यक वस्तुएँ: कुश (कुशा), जौ (jau), तिल (विशेषकर काले तिल) और जल।
- तर्पण करते समय व्यक्ति शुद्ध मन से पूर्वजों का स्मरण करे और पानी में इन वस्तुओं का अर्पण करे।
- पारंपरिक रूप से तर्पण करते समय निम्न मंत्र या अपने पूर्वजों के नाम लेकर पानी अर्पित किया जाता है।
- तिल (विशेषकर काला तिल) शनि/पितृ दोष शांत करने में उपयोगी माना जाता है — इसलिए पितृ पक्ष में तिल अर्पण का विशेष महत्व है।
3) पिंडदान — पिंड कैसे बनाएं और क्यों?
- पिंड बनाने की सामग्री: चावल (अक्षत), जौ, काले तिल और कभी-कभी गुड़/चावल का मिश्रण।
- चावल और जौ मिलाकर पिंड बनाकर उसे पितरों के लिए अर्पित किया जाता है।
- पिंडदान का अर्थ है — मृतक की आत्मा को भोजन-प्रदान और तृप्ति देना; इसे करने से माना जाता है कि पितृ शांत होते हैं और शोक/दु:ख से मुक्ति मिलती है।
4) श्राद्ध का भोजन और दान
- श्राद्ध के लिए पारंपरिक भोजन तैयार करें — खीर, पूरी, सब्जी, दाल आदि।
- सबसे पहले भोजन को कौवे, गाय, कुत्ते और देवताओं के लिए निकाला जाता है (कौवों को अन्न देना विशेष मंगलकारी माना जाता है)।
- इसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है।
- श्राद्ध के बाद गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य वस्तुओं का दान अवश्य करें — यह पितृ का आशीर्वाद प्राप्त करने का मुख्य मार्ग है।
5) तर्पण/श्राद्ध के बाद का संस्कार
- तर्पण के तुरंत बाद पिंडदान और श्राद्ध के नियमों का पालन करना चाहिए।
- शास्त्रों के अनुसार, जिनके पास पारंपरिक पित्तक ज्ञान नहीं है, उन्हें किसी योग्य पुरोहित या अनुभवी बुजुर्ग की सहायता लेनी चाहिए।
रात के समय विशेष उपाय (Pitru Paksh) — क्यों और कैसे करें

पितृ पक्ष (Pitru Paksh) के दौरान रात के उपायों का भी विशेष महत्व है — माना जाता है कि रात में पितर धरती पर आते हैं और इन उपायों से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है, घर की उन्नति होती है और कष्टों का अंत होता है। नीचे दिए गए उपायों को श्रद्धा से करें:
- पीपल के नीचे दीपक जलाना
- पितृ पक्ष (Pitru Paksh) के दौरान पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना शुभ माना जाता है।
- सर्वपितृ अमावस्या की रात विशेष रूप से यह उपाय किया जाता है।
- मान्यता है कि पीपल में पितरों का वास होता है — दीपक जलाने से पितरों को शांति मिलती है।
- दक्षिण दिशा में दीपक रखें (सरसों का तेल)
- कहा जाता है कि घर की दक्षिण दिशा में पितरों का वास होता है।
- इस दिशा में रोज़ाना सरसों के तेल का दीपक जलाकर रखें और उसे पितरों को समर्पित करें।
- इससे पितृ दोष शांत होता है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है।
- कौवों और कुत्तों को भोजन कराना
- रात में भोजन से पहले एक थाली में पितरों के लिए अन्न निकालें और उसे कौवों/कुत्तों को खिलाएँ।
- धार्मिक मान्यता है कि पितर इन रूपों में भोजन ग्रहण करते हैं — इससे पितरों की कृपा बनी रहती है।
- पितरों का ध्यान और नाम जप
- सोने से पहले शांत मन से अपने पितरों का स्मरण करें, उनके नामों का जाप करें और उनसे माफी माँगें।
- साधारण मनन, प्रणाम और आशीर्वाद की प्रार्थना से भी बहुत फल मिलता है।
श्राद्ध में प्रयुक्त पवित्र तत्व

1. कुश (Kusha) का महत्व
- भगवान विष्णु के वराह अवतार से कुशा की उत्पत्ति मानी जाती है।
- यह पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
- श्राद्ध में कुशा से बने आसन और तर्पण का विशेष महत्व है।
- माना जाता है कि कुशा पितरों तक जल और आहुति पहुंचाने का माध्यम बनती है।
2. तिल (Til) का महत्व
- तिल की उत्पत्ति विष्णु जी के पसीने से हुई मानी जाती है।
- यह नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेता है और शनि, राहु, केतु को शांत करता है।
- काले तिल से पिंडदान करने पर आत्मा को मोक्ष मिलता है।
3. अक्षत (चावल) का महत्व
- अक्षत यानी बिना टूटे चावल जीवन और धन-धान्य का प्रतीक है।
- चावल से बने पिंड पितरों को संतुष्ट करते हैं।
- माना जाता है कि चावल के दान से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।
पौराणिक कथा : दशरथ और पितृ पक्ष (Pitru Paksh)
पितृ पक्ष (Pitru Paksh) से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा सूर्यवंशी राजा दशरथ की है। उनके कोई संतान नहीं थी। ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें पितृ पक्ष में श्राद्ध करने की सलाह दी।
श्राद्ध और मां कामाक्षी की पूजा के बाद उन्हें चार पुत्रों का आशीर्वाद मिला – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। यही पितृ कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण माना जाता है।
दशरथ के निधन के बाद की स्थिति

अयोध्या के महाराज दशरथ राम के वनवास जाने के दुःख को सहन नहीं कर पाए और उनकी मृत्यु हो गई। उस समय राम, सीता और लक्ष्मण वन में थे, जबकि भरत कैकेय देश (मामा के घर) गए हुए थे।
जब भरत लौटे और उन्हें अपने पिता के निधन का समाचार मिला, तो वे गहरे शोक में डूब गए। उन्होंने अयोध्या लौटकर अपने पिता का अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर्म किए। किंतु हिंदू परंपरा के अनुसार, श्राद्ध और पिंडदान केवल एक बार नहीं होता, बल्कि विशेष तिथियों और तीर्थस्थलों पर भी किया जाता है।
मंदाकिनी नदी पर पिंडदान
बाद में जब भरत राम से मिलने चित्रकूट गए और दशरथ की मृत्यु का समाचार दिया, तो राम भी बहुत दुखी हुए। अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए उन्होंने मंदाकिनी नदी के पवित्र तट पर लक्ष्मण और सीता के साथ मिलकर पिंडदान किया।
- मंदाकिनी नदी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह प्रयागराज, गया और अन्य पवित्र स्थलों की तरह पितरों को तृप्त करने वाला स्थल माना जाता है।
- पिंडदान करते समय राम ने अपने पिता की आत्मा को स्मरण किया और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि वे जहां भी हों, शांति और मोक्ष को प्राप्त करें।
- सीता ने भी पूर्ण श्रद्धा से इस कर्म में सहभागिता निभाई।
पुष्कर में श्राद्ध और सीता का दिव्य दर्शन
राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के समय पुष्कर (वर्तमान राजस्थान) में भी श्राद्ध कर्म किया।
यहां एक अद्भुत घटना घटी—
जब राम पिंडदान कर रहे थे और ब्राह्मणों को भोजन अर्पित कर रहे थे, तभी अचानक सीता जी पीछे हटकर पेड़ों के पीछे छिप गईं।
राम ने आश्चर्य से पूछा – “जनकनंदिनी, आप अचानक क्यों छिप गईं?”
सीता ने बताया कि उन्होंने दिव्य नेत्रों से अपने ससुर महाराज दशरथ और उनके पूर्वजों को स्वर्ग से उतरकर पिंडदान स्वीकार करते देखा। वे सब राजसी वस्त्रों में थे और सीता वल्कल वस्त्रों (वनवास के वस्त्र) में थीं, इसलिए उन्हें संकोच हुआ और वे छिप गईं।
यह घटना राम के लिए भी आश्चर्य और चमत्कार का विषय थी। इससे यह विश्वास और भी गहरा हो गया कि पितरों को दिया गया पिंडदान वास्तव में उन तक पहुंचता है और वे इसे स्वीकार करते हैं।
राम-रावण युद्ध और पितृ पक्ष का संबंध
कहा जाता है कि राम-रावण युद्ध का प्रारंभ भी पितृ पक्ष (Pitru Paksh) के समय ही हुआ था।
- दक्षिणायन के पहले दिन राम ने पितरों की पूजा की।
- पूर्णिमा को पार्वण श्राद्ध किया।
- इसके बाद युद्ध का शंखनाद हुआ।
- अमावस्या से एक दिन पहले लक्ष्मण ने मेघनाद का वध किया।
यह प्रसंग पितृ पक्ष (Pitru Paksh) की शक्ति और महत्व को और भी गहरा बनाता है।
“राम द्वारा दशरथ का पिंडदान” केवल एक धार्मिक कर्म नहीं था, बल्कि यह पूरे पितृ पक्ष (Pitru Paksh) की शक्ति और महत्व को सिद्ध करने वाला प्रसंग है।
पितृ पक्ष (Pitru Paksh) केवल अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। यह पूर्वजों को सम्मान देने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर है।
कुश, तिल और अक्षत जैसे पवित्र तत्व, श्राद्ध की परंपराएं और राम-दशरथ की कथाएं हमें यह सिखाती हैं कि पूर्वजों की पूजा से जीवन में सुख-शांति आती है।
इसलिए हर व्यक्ति को पितृ पक्ष (Pitru Paksh) में अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध और दान अवश्य करना चाहिए।
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