हरछठ व्रत 2025: जानें ब्रह्म मुहूर्त से गोधूलि तक के सभी शुभ समय और ग्वालिन की कथा से जुड़ी प्राचीन परंपरा

हरछठ 2025 परंपरा, पूजा विधि, तिथि, महत्व और प्राचीन ग्वालिन की कथा — जानें कैसे यह पर्व संतान सुख और लंबी उम्र का प्रतीक है।
लखनऊ 13 अगस्त 2025: हरछठ व्रत, जिसे ललही छठ भी कहा जाता है, भारत के कई राज्यों में आस्था, संतान सुख और परिवार की समृद्धि के लिए मनाया जाने वाला एक प्राचीन पर्व है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को रखा जाता है और विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में इसकी धार्मिक मान्यता बेहद गहरी है।
माताएँ इस दिन अपनी संतान के सुख-समृद्धि, लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए उपवास रखती हैं। पूजा में गौरी-गणेश, हलषष्ठी माता और भगवान कृष्ण की आराधना की जाती है।
कहाँ-कहाँ मनाया जाता है
यह पर्व मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, असम, राजस्थान और गुजरात में मनाया जाता है।
- छत्तीसगढ़ में इसे हरछठ/ललही छठ कहा जाता है।
- राजस्थान में चंद्र षष्ठी के नाम से प्रसिद्ध है।
- गुजरात में रांधण छठ के नाम से मनाते हैं।
- ब्रज क्षेत्र में बलदेव छठ कहा जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और पौराणिक कथा
- बलराम की महिमा: पौराणिक कथाओं में, बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है, और यह पर्व उनकी कृषि से जुड़ी भूमिका (हल धारण करना) को सम्मानित करता है।
- भाषाई विविधता: Hal Shashti का कई नामों में जश्न मनाया जाना इस विश्वास की विविधता को दर्शाता है—Har Chhath, Lalahi Chhath, Baladeva Chhath, Randhan Chhath आदि।
तिथि और शुभ मुहूर्त (2025)

तिथि: 14 अगस्त 2025 (गुरुवार)
षष्ठी तिथि प्रारंभ: 14 अगस्त, सुबह 04:23 बजे
षष्ठी तिथि समाप्त: 15 अगस्त, सुबह 02:07 बजे
हरछठ व्रत /हलषष्ठी पूजा के शुभ मुहूर्त:
हरछठ के दिन पूजा के लिए कुछ खास समय बहुत शुभ माने जाते हैं। इन समय में पूजा करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ता है। साल 2025 में हलषष्ठी की पूजा के लिए ये शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं—
अमृत काल: सुबह 6:50 से 8:20 बजे तक (पूजा के लिए अत्यंत उत्तम समय)
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:23 से 5:07 बजे तक (बहुत ही पवित्र समय)
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:59 से 12:52 बजे तक (सभी कार्यों के लिए शुभ)
विजय मुहूर्त: दोपहर 2:37 से 3:30 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 7:01 से 7:23 बजे तक
हरछठ व्रत की पूजा सामग्री
- हलषष्ठी माता की प्रतिमा या चित्र
- कलश एवं जल
- दूब घास और आटे का छोटा हल
- गाय का कच्चा दूध, दही, घी
- फलों में नारियल, केला, सीताफल
- अनाज में चना, गेंहू, जौ
- पकवान – पूरी, हलवा, पुआ
- मिट्टी के दीपक और रुई की बत्ती
- पीला वस्त्र और रोली-कुमकुम
- धूप-दीप, फूल, अक्षत
पूजा विधि
- व्रती प्रातःकाल स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें।
- हलषष्ठी माता और भगवान कृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- कलश स्थापना कर उसके ऊपर नारियल रखें।
- आटे से बने छोटे-छोटे हल और बैल पूजा में रखें।
- दूब घास, फूल, रोली, कुमकुम, अक्षत अर्पित करें।
- कच्चे दूध-दही का भोग लगाएं।
- व्रत कथा का श्रवण करें और अंत में आरती करें।
- संतान को आशीर्वाद दें और व्रत का समापन करें।
हरछठ व्रत की प्राचीन कथा (ग्वालिन और झूठा दूध)

हरछठ यानी ललही छठ व्रत कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक ग्वालिन रहती थी। वह गर्भवती थी और जल्द ही प्रसव का समय आने वाला था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा और चिंता से व्याकुल थी, दूसरी ओर उसका मन दूध-दही बेचने में लगा हुआ था।
उसने सोचा, “यदि आज प्रसव हो गया तो दूध-दही यूं ही खराब हो जाएगा और मेरा नुकसान हो जाएगा।” यही सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए निकल पड़ी।
कुछ ही दूरी पर पहुंचने के बाद उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह पास की एक झरबेरी (बेर के पेड़ जैसी झाड़ी) के पीछे चली गई और वहीं एक बच्चे को जन्म दिया।
परंतु उसने अपने बच्चे को वहीं छोड़ दिया और दूध-दही बेचने के लिए गांव की ओर बढ़ गई। उस दिन हल षष्ठी थी। उसने गांव में गाय और भैंस के दूध को मिलाकर, केवल भैंस का दूध बताकर बेच दिया।
किसान और बैलों की घटना
जिस झरबेरी के नीचे ग्वालिन ने बच्चे को छोड़ा था, उसके पास के खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक किसान के बैल भड़क उठे और हल का फल (लोहे का नुकीला हिस्सा) बच्चे के शरीर में घुस गया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
किसान को यह देखकर अत्यंत दुख हुआ, लेकिन उसने साहस दिखाते हुए झरबेरी के कांटों से बच्चे के फटे पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।
ग्वालिन का पछतावा और प्रायश्चित
जब ग्वालिन दूध-दही बेचकर लौटी, तो उसने अपने बच्चे की हालत देखी और समझ गई कि यह उसकी गलती और पाप का परिणाम है। उसे एहसास हुआ कि झूठ बोलकर दूध बेचना, दूसरों को धोखा देना और धर्म का अपमान करना कितने गंभीर परिणाम ला सकता है।
उसने गांव लौटकर सबके सामने अपने पाप स्वीकार किए और प्रायश्चित करने का व्रत लिया। तब से हलषष्ठी माता की पूजा का महत्व और भी बढ़ गया, और यह हरछठ व्रत संतान सुख, सच्चाई और धार्मिकता के प्रतीक के रूप में प्रचलित हो गया।
हरछठ व्रत का महत्व
- संतान सुख: यह व्रत संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है।
- पारिवारिक एकता: व्रत के दौरान पूरे परिवार का साथ रहना और संयुक्त पूजा करना आपसी संबंध मजबूत करता है।
- कृषि और पशुधन का महत्व: हल और बैल पूजा में शामिल कर किसान जीवन और पशुओं की महत्ता को दर्शाया जाता है।
- सत्य और धर्म का संदेश: कथा से यह शिक्षा मिलती है कि झूठ और धोखा अंततः दुख लाता है।
विशेष मान्यताएँ

- इस दिन हल से जोता गया अन्न नहीं खाया जाता।
- गाय के दूध का सेवन निषेध है, केवल भैंस का दूध और उससे बने व्यंजन ही ग्रहण किए जाते हैं।
- महिलाएं इस दिन पीले या हरे वस्त्र धारण करती हैं।
- संतानहीन महिलाएं भी संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत रखती हैं।
व्रत का पारण
- शाम को पूजा समाप्ति के बाद सात्विक भोजन जैसे प्रसाद (घी, फल, दक्षिणा) ग्रहण करते हुए व्रत का पारण किया जाता है।
- व्रती महिलाओं के पुत्रों की लंबी आयु, सफलता, और दुखों से सुरक्षा की कामना होती है।
हरछठ व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व, सच्चाई और निष्ठा का उत्सव है। ग्वालिन की कथा हमें यह सिखाती है कि लालच और असत्य हमें भारी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकता है, जबकि सच्चाई, प्रायश्चित और भक्ति जीवन में शांति और सुख लाते हैं।
आज भी यह व्रत लाखों माताओं के दिल में आस्था का दीप जलाए हुए है, जो संतान के कल्याण के लिए उपवास और पूजा करती हैं। हरछठ व्रत हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की जीवंत मिसाल है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है।
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