जन्माष्टमी 2025: श्रीकृष्ण अवतार की पौराणिक कथा महत्व, पूजा विधि और मुहूर्त की संपूर्ण गाइड

जानें जन्माष्टमी 2025 का अध्यात्मिक महत्व, पूजा विधियाँ, इतिहास और शुभ मुहूर्त—उस दिव्य रात की पूरी गाथा जिसमें श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और दशकर्म हुआ। जानिए कथा से लेकर विधि और उत्सव तक सब कुछ।
लखनऊ 13 अगस्त 2025: जन्माष्टमी (Janmashtami) वह शुभ पर्व है जो हर वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और उनके लीला-रूप के प्रकाश का पर्व है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं, भक्ति के माध्यम से भगवान कृष्ण का स्मरण करते हैं और जीवन में धर्म, प्रेम और नैतिकता के उच्च आदर्शों को अपनाने का संकल्प लेते हैं।
यह वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को 16 अगस्त 2025 को उल्लासपूर्वक मनाया जाएगा, जिसमें रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की पूजा और आरती की जाती है—जब स्वयं अष्टमी तिथि में जन्मोत्सव का प्रारंभ होता है।
जन्माष्टमी तिथि और शुभ मुहूर्त
- अष्टमी प्रारंभ: 15 अगस्त 2025, रात्रि 11:49 बजे
- अष्टमी समाप्ति: 16 अगस्त 2025, रात्रि 21:34 बजे
- गोप-स्थान (पूजा) मुहूर्त: 16 अगस्त 2025, बीच रात 12:04 से 12:47 (43 मिनट विशेष शुभ)
रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ
इस साल रोहिणी नक्षत्र 17 अगस्त को सुबह 4 बजकर 38 मिनट पर शुरू होगा और यह 18 अगस्त को 3 बजकर 17 मिनट तक रहेगा.
इस समय की महिमा इसलिए है क्योंकि यह न केवल अष्टमी की आध्यात्मिक पूर्णता को दर्शाता है, बल्कि इस पावन समय में किए गए पूजन और भजन की सुखद अनुभूति अधिक गहरी मानी जाती है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कथा- जन्म से लेकर नकली कृष्ण की चुनौती तक

मथुरा नगरी में कंस नाम का अत्याचारी राजा राज करता था। वह अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव से बहुत प्रेम करता था, लेकिन एक भविष्यवाणी ने सब बदल दिया। आकाशवाणी हुई—
“हे कंस! तुम्हारी बहन देवकी की आठवीं संतान ही तुम्हारे अंत का कारण बनेगी।”
कंस डर से काँप उठा और तुरंत देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया। उसने निश्चय कर लिया कि देवकी की हर संतान का जन्म होते ही वध कर देगा। एक-एक करके सात संतानों का वध हुआ।
लेकिन जब आठवीं संतान का जन्म हुआ—अर्धरात्रि, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में—कारागार के दरवाज़े स्वतः खुल गए। पहरेदार गहरी नींद में सो गए और वसुदेव के हाथों की बेड़ियाँ गिर पड़ीं। भगवान विष्णु का स्वयं प्रकट रूप, श्रीकृष्ण, उनके सामने थे—चार भुजाओं वाले, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए।
वसुदेव ने उन्हें गोद में लिया और गोकुल पहुँचकर नंद-यशोदा के घर नवजात कन्या को ले आए। जब कंस को खबर मिली, वह कारागार पहुँचा और कन्या को मारने का प्रयास किया—लेकिन वह कन्या आकाश में उड़कर योगमाया के रूप में प्रकट हुई और बोली—
“हे कंस! तेरा संहारक जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित है।”
गोकुल की बाललीलाएँ

गोकुल में श्रीकृष्ण का बचपन आनंद, संगीत और अद्भुत लीलाओं से भरा था। वे बांसुरी की मधुर तान से सबका मन मोह लेते, गोपियों के साथ रास रचाते, माखन चुराकर मटकी फोड़ देते, और ग्वालबालों के साथ खेलते-कूदते।
लेकिन कंस चैन से नहीं बैठा। उसने बार-बार असुर भेजे—पूतना, त्रिणावर्त, अघासुर—लेकिन हर बार श्रीकृष्ण ने अपने बालरूप में ही इनका वध कर दिया।
कंस वध
आखिरकार कंस ने अक्रूर को भेजकर कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। कुश्ती के मैदान में, मल्लविद्या के उस्ताद चाणूर और मुष्टिक को हराने के बाद, श्रीकृष्ण ने स्वयं कंस का वध कर दिया। मथुरा के लोग अत्याचार से मुक्त हुए और कृष्ण का यश चारों ओर फैल गया।
नकली कृष्ण — पौंड्रक की चुनौती
यश फैलने के साथ-साथ ईर्ष्या और नकल करने वालों की संख्या भी बढ़ी। पौंड्रक नाम का एक राजा यह दावा करने लगा कि वही असली कृष्ण है। उसने नकली सुदर्शन चक्र, मोरपंख मुकुट, और कौस्तुभ मणि बनवाकर पहन लिए।
उसने श्रीकृष्ण को संदेश भेजा—
“या तो तुम अपनी पहचान छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।”
मथुरा के लोग हैरान थे, लेकिन कृष्ण शांतचित्त थे। वे जानते थे कि नकली दमक ज्यादा देर टिकती नहीं।
युद्ध का दिन आया। पौंड्रक ने पूरी कोशिश की कि वह कृष्ण जैसा दिखे—लेकिन उसकी चाल में वह गरिमा, उसके नेत्रों में वह करुणा और उसकी आभा में वह दिव्यता नहीं थी।
श्रीकृष्ण ने अपने असली सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। क्षण भर में पौंड्रक का नकली रूप टूट गया, और उसका अभिमान धूल में मिल गया।
कथा का संदेश

श्रीकृष्ण की यह कथा न केवल उनके अद्भुत पराक्रम को दर्शाती है, बल्कि हमें यह भी सिखाती है कि सत्य और मौलिकता को कोई नकल परास्त नहीं कर सकती। बाहरी सजावट से नहीं, बल्कि कर्म और आचरण से ही असली पहचान बनती है।
जन्माष्टमी पूजा-विधि
- स्नान एवं स्वच्छ वस्त्र: जन्माष्टमी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके पवित्र वस्त्र पहनें।
- अभिषेक: गोपाल की प्रतिमा को दूध, दही, घी एवं कलश जल से अभिषेक करें—तत्पश्चात साफ वस्त्र, मुकुट, नंव्वा (जबों पर पट्टी) पहनाएं।
- стри-वेदना और कथा: रात 12 बजे कथा और आरती का आयोजन आवश्यक है। भक्त पूरी श्रद्धा के साथ कृष्ण की स्तुति में मग्न होते हैं।
- व्रत विधि: दिनभर अनाज से परहेज है; व्रत पारण में फल, लड्डू और सिंघाड़े से बने व्यंजन ग्रहण करें।
जन्माष्टमी पूजा के नियम व सावधानियाँ
- मुरझाए फूल नहीं—ताजगी और श्रद्धा का प्रतीक हैं।
- गौ का सम्मान करें—कृष्ण का ग्वाल रूप हमारा संदेश है।
- तुलसी पत्तियाँ पहले ही तोड़कर रख लें—पूजा में ताज़ा पत्तियों का ही प्रयोग करें।
- पीला वस्त्र धारण करें—ऐसा करने से भक्त अपने ह्रदय में उल्लास को बनाए रखते हैं।
जन्माष्टमी का आध्यात्मिक महत्व और संदेश

- सत्य और धर्म का सम्मान: राजसत्ता से भी धर्म बड़ा होता है।
- नई शुरुआत का प्रतीक: कठिन परिस्थितियों से बचाने वाला प्रकाश—ईश्वर हमारे मार्गदर्शक हैं।
- नकली बनाम असली: पौंड्रक की कथा से हम सीखते हैं कि असली गुण ही जीवन में टिकते हैं; दिखावे पर विश्वास करना मूर्खता है।
जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि यह सत्य, धर्म, प्रेम और मातृत्व का सार्वकालिक पाठ है। इस पावन रात की आरती से, हम अपने जीवन में भी उस दिव्यता को प्रवेश करने का निमंत्रण देते हैं—वह दिव्यता जो सत्य, भक्ति और जीवन आदर्शों के माध्यम से प्रकट होती है।
श्रीकृष्ण की कृपा आपके परिवार पर बनी रहे—इस श्रद्धा और आस्था के साथ, शुभ जन्माष्टमी!
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