SIR विवाद: बंगाल से बांग्लादेश जा रही अवैध प्रवासियों की भीड़ !

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की जांच (SIR) ने तूफान ला दिया। हाकिमपुर बॉर्डर से सैकड़ों अवैध प्रवासी वापस लौट रहे। जानें पूरा मामला।
कोलकाता 23 Nov । पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) यानी मतदाता सूची की सख्त जांच ने राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। भाजपा का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के लिए बड़े पैमाने पर अवैध घुसपैठ होने दी। वहीं, टीएमसी ने पलटवार करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार असुरक्षित समुदायों को डरा रही है और एसआईआर को एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। लेकिन दक्षिण 24 परगना जिले के हाकिमपुर बॉर्डर पर मौजूद हालात खुद ही इस पूरे मामले की सच्चाई बयां कर रहे हैं।
SIR side effect :“हमें घर जाने दीजिए” – बॉर्डर पर मची भगदड़
हाकिमपुर स्थित बीएसएफ चौकी के पास एक कच्चे, धूल भरे रास्ते पर शनिवार को असामान्य हलचल देखने को मिली। बरगद के पेड़ की छांव तले, छोटे-छोटे बैग लिए परिवार, बच्चों के हाथों में पानी की बोतलें और चुपचाप बैठे पुरुष सभी एक ही विनती दोहराते दिखे: ‘हमें घर जाने दीजिए।’ ये वे लोग हैं, जिन्हें सुरक्षा एजेंसियां ‘अवैध बांग्लादेशी निवासी’ बता रही हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने वर्षों तक पश्चिम बंगाल के अलग-अलग इलाकों में रहकर काम किया, कथित तौर पर दलालों की मदद से पहचान पत्र बनवाए, और अब अचानक एसआईआर की कार्रवाई के चलते वापस लौटने की कोशिश में हैं।

“दस्तावेज ठीक नहीं थे, अब लौटना बेहतर”
खुलना जिले की रहने वाली शाहिन बीबी अपने छोटे बच्चे के साथ सड़क किनारे इंतज़ार कर रही थीं। वह कोलकाता के न्यू टाउन इलाके में घरों में काम करके महीने के 20,000 रुपये तक कमाती थीं। उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा, “हम गरीबी के कारण आए थे। हमारे दस्तावेज ठीक नहीं थे। अब जांच हो रही है, इसलिए लौटना ही बेहतर लग रहा है।” शाहिन जैसे कई लोग मानते हैं कि उन्होंने आधार, राशन कार्ड या वोटर आईडी जैसे जरूरी कागजात दलालों और बिचौलियों के जरिए बनवाए थे। एसआईआर की प्रक्रिया में इन्हीं पुराने कागजात की दोबारा सख्ती से जांच हो रही है, इसलिए लोग पूछताछ और हिरासत से बचने के लिए खुद-ब-खुद सीमा पर आ पहुंचे हैं।
बीएसएफ की बढ़ी भूमिका, संसाधनों पर दबाव
बीएसएफ के अधिकारियों ने बताया कि हर दिन 150 से 200 लोग पकड़े जा रहे हैं और जांच के बाद उन्हें वापस भेजा जा रहा है। 4 नवंबर यानी एसआईआर शुरू होने के बाद से ही यहां भीड़ बढ़नी शुरू हो गई है। सभी लोगों के बायोमैट्रिक डेटा लेकर पुलिस और प्रशासन को भेजा जाता है। भीड़ ज्यादा होने पर लोगों को दो-तीन दिन तक इंतज़ार करना पड़ रहा है। गेट के अंदर बीएसएफ जरूरतमंदों के लिए खाने का इंतजाम कर रही है, जबकि बाहर इंतज़ार कर रहे लोग सड़क किनारे लगे चाय-ढाबों पर निर्भर हैं।
“20,000 रुपये खर्च कर बनवाए थे कागज”
इस पूरे घटनाक्रम ने अवैध प्रवासन के चलन पर से पर्दा उठा दिया है। 29 वर्षीय मनीरुल शेख, जो एक होटल में वेटर का काम करते थे, बताते हैं, “हमने 5,000 से 7,000 रुपये देकर भारत में एंट्री ली थी। लेकिन यहां रहने और काम करने के लिए कागज बनवाने में 20,000 रुपये तक खर्च हो गए। अब एसआईआर की जांच से सब डर गए हैं।” वहीं, इमरान गाजी नाम के एक व्यक्ति ने हैरान कर देने वाला खुलासा करते हुए कहा, “मैंने 2016, 2019, 2021 और 2024- चार बार वोट दिया है। पर मेरे पास 2003 का कोई असली कागज नहीं है। इसलिए लौट रहा हूं।”
“हमारे पास इतनी जगह नहीं” – पुलिस अधिकारी
स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “दो दिन में 95 लोग आए थे। हमारे पास इतनी जगह ही नहीं है। बाद में हमने हिरासत लेना बंद कर दिया।” एक स्थानीय निवासी ने इस पूरे दृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा, “ये लोग रात के अंधेरे में आए थे… अब दिन की रोशनी में लौट रहे हैं। फर्क बस इतना ही है।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले छह दिनों में करीब 1,200 लोग आधिकारिक प्रक्रिया पूरी कर बांग्लादेश लौट चुके हैं, जबकि शनिवार को भी करीब 60 लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। यह स्थिति स्पष्ट कर रही है कि एसआईआर का राजनीतिक घमासान अब जमीनी हकीकत बनकर सामने आ रहा है।
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