कोर्ट में केंद्र की दलील: मंदिर धार्मिक, वक्फ (waqf) धर्मनिरपेक्ष!

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ(waqf) (संशोधन) अधिनियम, 2025 की वैधता को लेकर चल रही सुनवाई में केंद्र सरकार ने बड़ा बयान दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि वक्फ (waqf) इस्लाम का मूल या अनिवार्य हिस्सा नहीं है, बल्कि यह केवल दान (चैरिटी) की एक व्यवस्था है — जैसे ईसाइयों में चैरिटी, हिंदुओं में दान और सिख धर्म में सेवा की परंपरा है।
वक़्फ़ (waqf) और मंदिर:
तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि वक्फ (waqf) बोर्ड धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों से जुड़े होते हैं, जबकि मंदिर एक विशुद्ध धार्मिक संस्था होते हैं, और उनका प्रबंधन कोई मुस्लिम व्यक्ति भी संभाल सकता है। मेहता ने यह भी स्पष्ट किया कि नए कानून में ‘वक्फ-बाय-यूज़र’,(waqf By User) यानी केवल लंबे समय तक धार्मिक उपयोग के आधार पर किसी ज़मीन को वक्फ((waqf) घोषित करने की व्यवस्था हटा दी गई है। उन्होंने कहा कि अगर कोई संपत्ति सरकारी है, तो उसे कोई भी संस्था स्थायी रूप से नहीं रख सकती, सरकार को उसे वापस लेने का अधिकार है, भले ही वह ज़मीन वक्फ घोषित कर दी गई हो।
केंद्र सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि 1923 से चली आ रही वक्फ से जुड़ी समस्याओं को नए कानून से हल किया गया है। सरकार के अनुसार, इस प्रक्रिया में 96 लाख से अधिक सुझाव प्राप्त हुए और संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने 36 बार बैठकें कीं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि कुछ याचिकाकर्ता यह दावा नहीं कर सकते कि वे पूरे मुस्लिम समुदाय की राय का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को तब तक संवैधानिक माना जाता है, जब तक कि उसके खिलाफ कोई स्पष्ट और गंभीर आपत्ति न हो। जब याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने अपनी दलीलें रखनी शुरू कीं, तो सीजेआई ने कहा कि अंतरिम राहत के लिए बेहद ठोस आधार पेश करना जरूरी होता है।
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