सुप्रीम कोर्ट: आधार कार्ड निवास का निर्णायक सबूत नहीं

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Aadhaar proof

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड निवास का पक्का सबूत नहीं है। बिहार में SIR प्रक्रिया पर विवाद जारी। #SupremeCourt #Aadhaar


नई दिल्ली।12 Aug सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आधार कार्ड (Aadhaar) को किसी व्यक्ति के निवास का अंतिम और पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी बिहार में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के संदर्भ में आई है, जहां मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जा रहे हैं।

Aadhaar Not Proof Of Residence:“आधार, राशन या वोटर आईडी निर्णायक सबूत नहीं”

सुप्रीम कोर्ट में RJD नेता मनोज झा की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि लोगों के पास आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी (EPIC) जैसे दस्तावेज हैं, लेकिन अधिकारी इन्हें निवास का पुख्ता प्रमाण नहीं मान रहे। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा,

“ये दस्तावेज दिखा सकते हैं कि आप किसी क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन इन्हें निर्णायक सबूत नहीं कहा जा सकता।”

मतदाता सूची में विसंगतियों का आरोप

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने आरोप लगाया कि बिहार की मतदाता सूची में कई गड़बड़ियां हैं। उन्होंने कहा,

“कुछ लोगों को मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वे जिंदा हैं। कुछ के मामले में उल्टा हुआ है।”

इस पर जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने कहा कि यह विवाद चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच भरोसे की कमी के कारण बढ़ा है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि बिहार में किसी के पास वैध दस्तावेज ही नहीं

चुनाव आयोग का पक्ष

चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर काम करते समय कुछ त्रुटियां होना स्वाभाविक है, लेकिन 30 सितंबर तक अंतिम सूची जारी होने से पहले इन्हें ठीक किया जा सकता है।

क्या है विपक्ष की चिंता?

बिहार में 1 अगस्त को मसौदा मतदाता सूची जारी की गई, जबकि अंतिम सूची 30 सितंबर को आएगी। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया से करोड़ों वैध मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है। इस मामले में RJD, TMC, कांग्रेस, NCP (शरद पवार), CPI, शिवसेना (उद्धव ठाकरे), JMM, CPI (ML) के साथ PUCL, ADR और योगेंद्र यादव ने संयुक्त याचिका दायर की है।

सुप्रीम कोर्ट ने आधार (Aadhaar) को निवास का पक्का सबूत नहीं माना है, लेकिन यह मामला बिहार में चल रही राजनीतिक उठापटक को दर्शाता है। अब देखना है कि 30 सितंबर तक चुनाव आयोग किस तरह विपक्ष की चिंताओं को दूर करता है।

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