‘भारत छोड़ो’ के पहले शहीद RSS स्वयंसेवक उमाकांत काडिया!

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वंदे मातरम पर लोक सभा में बहस के दौरान जब अमित शाह ने कहा कि देश के लिए मरना RSS की विचारधारा तो बहुत से लीब्रण्डू बोले पहले किसी एक RSS worker का नाम बता दो जिसने देश के लिए क़ुरबानी दी हो तो जानिए ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के पहले शहीद, RSS स्वयंसेवक उमाकांत काडिया की अमर गाथा। 21 साल की उम्र में दी थी कुर्बानी। #IndianHistory

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15 अगस्त 2024 को देश ने अपनी 77वीं स्वतंत्रता की वर्षगांठ मनाई। यह आज़ादी लाखों क्रांतिकारियों के अथक संघर्ष और असंख्य वीरों के बलिदान का परिणाम है। इतिहास के पन्नों में कुछ नाम तो अंकित हो गए, परन्तु अनेक ऐसे सूरमा हैं जो सामूहिक स्मृति से ओझल होते चले गए। ऐसे ही एक विस्मृत वीर हैं – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS ) के स्वयंसेवक उमाकान्त मोतीराम काडिया, जिन्होंने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत में ही अपने रक्त से देश के स्वाधीनता संकल्प को सींचा और इस महत्वपूर्ण आंदोलन के ‘प्रथम शहीद’ बन गए।

वह ऐतिहासिक दिन: 9 अगस्त, 1942

महात्मा गांधी के आह्वान पर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की औपचारिक शुरुआत 8 अगस्त, 1942 को हुई। अगले ही दिन, 9 अगस्त को, इसकी चिंगारी अहमदाबाद की सड़कों पर धधक उठी। शहर के खादिया इलाके में जनसैलाब उमड़ पड़ा। इस जनसमूह के नेतृत्व की कमान 21 वर्षीय एक युवक के हाथों में थी – उमाकांत काडिया। वह न केवल एक उत्साही युवा थे, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS ) के एक समर्पित स्वयंसेवक और एक शाखा के मुख्य शिक्षक भी थे।

जैसे-जैसे प्रदर्शन तेज़ हुआ, ब्रिटिश सैनिकों ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी। खादिया इलाके में तनाव चरम पर था। उमाकांत काडिया अपने साथियों के साथ प्रदर्शन की अग्रिम पंक्ति में डटे हुए थे। जब स्थिति गंभीर हो गई, तो कुछ लोगों ने उन्हें पीछे हटने का आग्रह किया। लेकिन उमाकांत अडिग रहे। एक नौजवान में इस तरह का निडर साहस देखकर एक अंग्रेज़ अधिकारी ने गोली चला दी। गोली सीधे उमाकांत को लगी और वहीं पर उन्होंने वीरगति प्राप्त की। इस प्रकार, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत के महज 24 घंटों के भीतर, देश ने अपना पहला शहीद खो दिया।

एक संक्षिप्त पर गौरवशाली जीवनयात्रा

उमाकांत काडिया का जन्म अहमदाबाद के दरीयापुर इलाके में हुआ था। कम उम्र में ही उनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS )के विचारों से हुआ और वे उसके सक्रिय स्वयंसेवक बन गए। संघ की शिक्षाओं ने उनके अंदर देशभक्ति और समाज सेवा की भावना को और प्रबल किया। वह केवल एक सैनिक नहीं, बल्कि एक शिक्षक भी थे, जो अपने से छोटे स्वयंसेवकों को संस्कार और देशप्रेम की शिक्षा देते थे। उनकी शहादत न केवल उनके व्यक्तिगत साहस, बल्कि उस संगठन की प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है, जिससे वह जुड़े थे।

इतिहास के पन्नों में एक नाम की तलाश

दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद के इतिहास लेखन में उमाकांत काडिया जैसे अनेक वीरों के योगदान को वह स्थान नहीं मिल सका, जिसके वह हकदार थे। कई विश्लेषकों का मानना है कि तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस और कम्युनिस्टों जैसे वामपंथी दलों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS ) की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को जानबूझकर उपेक्षित रखा। इसका परिणाम यह हुआ कि आरएसएस के हज़ारों स्वयंसेवकों, जिन्होंने आंदोलनों में भाग लिया, जेल की यातनाएं सहीं और उमाकांत की तरह बलिदान दिया, उनकी गाथाएँ मुख्यधारा के इतिहास से गायब हो गईं। उमाकांत काडिया की शहादत इस धारणा को चुनौती देती है कि आरएसएस ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी नहीं निभाई।

स्मृति के मंदिर: एक शहीद को नमन

आज, अहमदाबाद के खादिया इलाके में, उसी पावन स्थल पर जहाँ उमाकांत काडिया ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, एक स्मारक बना हुआ है। यह स्मारक न केवल एक वीर युवा को श्रद्धांजलि है, बल्कि उस पूरी पीढ़ी का प्रतीक है जिसने बिना किसी व्यक्तिगत लोभ-लालच के, केवल मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

उमाकांत काडिया की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत की स्वतंत्रता का मार्ग केवल कुछ चुनिन्दा नेताओं द्वारा नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने से आए अनगिनत अज्ञात युवाओं के रक्त और पसीने से प्रशस्त हुआ। उनका बलिदान इस बात का जीवंत उदाहरण है कि देशप्रेम किसी एक विचारधारा या संगठन की बपौती नहीं है। आज का भारत उन सभी विस्मृत हीरोज़ के ऋण से बंधा हुआ है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम उमाकांत काडिया जैसे वीरों की स्मृति को सदैव अक्षुण्ण रखें और आने वाली पीढ़ियों को उनके समर्पण की गाथा सुनाएं। उनकी शहादत हमें यह शिक्षा देती है कि स्वतंत्रता अमूल्य है और उसकी रक्षा के लिए सतर्कता व देशभक्ति हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है।

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