Bahraich Violence : एक को फांसी, 9 को उम्रकैद की सजा!

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Bahraich Violence

 उत्तर प्रदेश के बहराइच में दुर्गा विसर्जन के दौरान हुई हिंसा (Bahraich Violence) में रामगोपाल मिश्रा की हत्या के मामले में कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला। पढ़ें पूरी खबर।

लखनऊ ३ dec उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में पिछले वर्ष दुर्गा पूजा के दौरान हुई साम्प्रदायिक हिंसा की घटना में एक युवक की निर्मम हत्या के मामले में अदालत ने कठोर फैसला सुनाया है। बहराइच की एक सत्र अदालत ने मुख्य आरोपी सरफराज उर्फ रिंकू को फांसी की सजा सुनाई है, जबकि अन्य नौ आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी गई है। यह फैसला पीड़ित परिवार और प्रशासन के लिए न्याय की एक महत्वपूर्ण जीत मानी जा रही है।

Bahraich Violence : क्या था मामला?
यह दुखद घटना 13 अक्टूबर, 2024 को Bahraich के महराजगंज कस्बे में घटी। दुर्गा मूर्ति विसर्जन के अवसर पर निकली एक शोभायात्रा के दौरान डीजे पर बज रहे संगीत को लेकर उस मुहल्ले के मुसलमानो और हिन्दुओ के बीच विवाद शुरू हो गया। यह विवाद देखते-देखते इतना भीषण रूप ले गया कि पूरा इलाका हिंसा की आग में धधक उठा। हिंसा के दौरान 22 वर्षीय रामगोपाल मिश्रा को गोली मार दी गई, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। इसके अलावा कई अन्य लोग भी घायल हुए। उन्मादी भीड़ ने मकानों, दुकानों, वाहनों और यहां तक कि एक स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र को भी निशाना बनाते हुए भारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।

त्वरित कार्रवाई और जांच
Bahraich की घटना के तुरंत बाद पुलिस और प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करते हुए 13 संदिग्धों को गिरफ्तार किया और उन पर आवश्यक कानूनी धाराएं लगाईं। गंभीरता को देखते हुए, जिला प्रशासन ने आरोपियों में से आठ – मरूफ अली, ननकऊ, मोहम्मद फहीम, मोहम्मद अफजल, मोहम्मद जीशान, जावेद, शोएब खान और सैफ अली के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने का आदेश दिया। यह कदम हिंसा को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बहाल करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

अदालत का कठोर फैसला
लगभग एक वर्ष चले मुकदमे के बाद, अदालत ने अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने सुनवाई में प्रस्तुत सबूतों को पुख्ता पाते हुए दस आरोपियों को दोषी ठहराया। सबसे गंभीर आरोपी सरफराज उर्फ रिंकू, जिस पर हत्या का प्रत्यक्ष आरोप साबित हुआ, को मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई गई। शेष नौ आरोपियों – फहीम, सैफ अली, जावेद खान, अब्दुल हमीद, तालिब उर्फ सबलू, ईसान, सुएब खान, ननकऊ और मारूफ को आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा दी गई। दिलचस्प बात यह है कि इनमें अब्दुल हमीद और उसके तीन बेटे शामिल हैं, जो पारिवारिक स्तर पर हिंसा में शामिल होने के आरोप में दोषी पाए गए। हालांकि, तीन अन्य आरोपियों – शकील अहमद, बबलू अफजल उर्फ कल्लू और खुर्शीद को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।

न्यायिक संदेश और सामाजिक प्रभाव
यह फैसला केवल एक मामले का निपटारा भर नहीं है, बल्कि एक स्पष्ट न्यायिक संदेश है। अदालत के इस कठोर फैसले से यह सिद्ध होता है कि सामूहिक हिंसा और साम्प्रदायिक उन्माद में की गई हत्या जैसे गंभीर अपराधों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलेगी। यह फैसला समाज के सभी वर्गों में कानून के शासन के प्रति विश्वास को मजबूत करता है। इसने यह भी संकेत दिया है कि त्वरित और निष्पक्ष जुदाई के साथ-साथ NSA जैसे कड़े कानूनों का प्रयोग ऐसी हिंसा को रोकने में एक निवारक के रूप में काम कर सकता है।

बहराइच हिंसा का यह मामला और इस पर आया फैसला, देश भर में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाए रखने और कानून-व्यवस्था को सख्ती से लागू करने की अहमियत को रेखांकित करता है। यह उम्मीद की जाती है कि ऐसे न्यायिक फैसले भविष्य में किसी भी प्रकार की सामूहिक हिंसा पर अंकुश लगाने में मील का पत्थर साबित होंगे।

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