विभाजन विभीषिका: दलितों पर मुस्लिम लीग के अत्याचार और ‘जय भीम जय मीम’ का घातक छल!

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स्वतंत्रता की दीपशिखा के साथ ही एक अन्य अग्निशिखा भी भड़की जिसकी ज्वाला ने दलित जनजीवन को घेर लिया। यह घटना केवल सीमांकन नहीं थी, यह अस्तित्व के विरुद्ध सुनियोजित आक्रमण था जिसमें सबसे पहले और सबसे निर्ममता से प्रहार दलित हिन्दुओं पर हुआ।

By: धर्मपाल सिंह, उत्तर प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री |

विभाजन विभीषिका

14 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं, वह दलित हिन्दुओं की असह्य वेदना का शोक सूत्र है। यह वही दिन है जब 1947 के राजनीतिक विभाजन के साथ धार्मिक उन्माद की लहरें उठीं और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संगठित हिंसा का ऐसा प्रलय उमड़ा कि अनुसूचित समाज की बस्तियां राख हो गईं, असंख्य घर उजड़ गए, अस्मिता का ताड़न हुआ और पीढ़ियों तक अंकुरित होने वाली आशा का बीज कुचल दिया गया। स्वतंत्रता की दीपशिखा के साथ ही एक अन्य अग्निशिखा भी भड़की जिसकी ज्वाला ने दलित जनजीवन को घेर लिया। यह घटना केवल सीमांकन नहीं थी, यह अस्तित्व के विरुद्ध सुनियोजित आक्रमण था जिसमें सबसे पहले और सबसे निर्ममता से प्रहार दलित हिन्दुओं पर हुआ।

विभाजन की साधारण कथा में प्रायः हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच हुए संघर्ष का उल्लेख भर रह जाता है, पर उसके भीतर दबा वह रक्तरंजित अध्याय आंखें चुराकर निकल जाता है जिसमें अनुसूचित समाज मुस्लिम लीग की कट्टर राजनीतिक प्रवृत्ति का सर्वप्रथम और सरल लक्ष्य बना। उनकी आर्थिक दुर्बलता, सामाजिक असुरक्षा और राजनीतिक निर्बलता को लक्ष्य कर उन्हें चुन चुनकर सताया गया, गांव खाली कराए गए, मंदिरों को अपवित्र कर गिराया गया और जीवन यापन के साधन जला डाले गए। यही कारण है कि विभाजन विभीषिका दिवस केवल स्मरण नहीं, सावधान संकेत भी है कि जब राजनीति संकीर्ण स्वार्थ में फंसती है, तब सभ्यता अपने ही दुर्बल अंगों पर आघात करके स्वयं को घायल कर लेती है।

इस इतिहास के हृदय स्थल में एक करुण और कटु सत्य जोगेंद्र नाथ मंडल का भी है। वे पाकिस्तान के प्रथम कानून एवं श्रम मंत्री बने, अनुसूचित समाज के अग्रणी नेता रहे और विभाजन से पूर्व दलितों को मुस्लिम लीग के साथ जाने का आव्हान उन्होंने स्वयं किया। उनका तर्क था कि मुसलमान भी शोषित हैं, अतः दलित-मुस्लिम एकजुट होकर नई राजनीति का निर्माण करेंगे। इसी विश्वास पर लाखों दलित हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान में रुक गए, अनेक ने मतदान में मुस्लिम लीग के पक्ष का समर्थन किया, अनेक ने दंगों के बीच हथियार उठाने से अपने को रोका। परंतु सत्ता मिलते ही मुस्लिम लीग ने वह मुखौटा उतार फेंका जिसके पीछे वह वचन छिपा था। गैर-मुस्लिम को, चाहे वह सवर्ण हो या दलित, एक साथ दूसरा ठहरा दिया गया और धार्मिक कठोरता के प्रहार का विषय बनाया गया।

1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को जो इस्तीफ़ा पत्र लिखा, वह विभाजन के बाद दलितों पर घटित अमानवीयता का साक्ष्य है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि स्लीट ज़िले में निर्दोष हिंदुओं, विशेषकर अनुसूचित जातियों पर पुलिस और सेना ने अत्याचार किए, पुरुषों को पीटा गया, स्त्रियों की लाज लूटी गई, घरों को लूटा और जला दिया गया, सैकड़ों मंदिरों और गुरुद्वारों को अपवित्र कर नष्ट कर दिया गया और उन्हें कसाईखानों, मोची की दुकानों तथा मांस परोसने वाले होटलों में बदल दिया गया। गोपालगंज के दिघरकुल में झूठे आरोप गढ़कर सशस्त्र पुलिस ने पूरे नामशूद्र गांव को पैरों तले रौंद दिया। बारीसाल के गौरनाडी में राजनीतिक बहाने बनाकर दलित बस्तियों पर हमले किए गए। ढाका दंगों के समय पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में आभूषण की दुकानों को लूटा गया और आग के हवाले कर दिया गया। मंडल ने कलशिरा गांव का उल्लेख किया- तीन सौ पचास बस्तियों में से केवल तीन बचीं, शेष सब राख में मिल गईं। यह वर्णन कोई अतिरंजना नहीं था, यह वही इतिहास था जो दलित परिवारों की चिताओं से उठते धुएं में लिखा जा रहा था।

आंकड़े स्वयं बोलते हैं। 1947 से 1950 के बीच पूर्वी पाकिस्तान से भारत आए लगभग पच्चीस लाख शरणार्थियों में व्यापक संख्या अनुसूचित समाज की थी। यह केवल पलायन नहीं, सुरक्षा और सम्मान की अंतिम आशा का पलायन था। दलितों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार निरस्त किए गए, सार्वजनिक जीवन में उनका स्थान संकुचित कर दिया गया और लगभग तीस प्रतिशत दलित हिन्दू जनसंख्या का भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया। जोगेंद्र नाथ मंडल ने जिन्ना और लियाकत अली को अनेक पत्र लिखे, पर इस्लामी शासन तंत्र ने अनसुना किया। अंततः मंडल स्वयं निराश, व्यथित और आत्मग्लानि से भरे भारत लौटे। उनके शब्द थे कि स्थिति केवल असंतोषजनक नहीं, पूर्णतया निराशाजनक और अंधकारमय है। यह स्वीकारोक्ति केवल व्यक्तिगत वेदना नहीं थी, यह उस ऐतिहासिक भूल का संकेत था जिसमें दलित समाज को ऐसे राजनीतिक गठबंधन पर भरोसा करने को प्रेरित किया गया जो उनके धर्म, संस्कृति और अस्मिता के प्रतिकूल था।

बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस परिणाम की चेतावनी बहुत पहले दे दी थी। पाकिस्तान और भारत का विभाजन तथा पाकिस्तान पर अपने विचार में उनका विश्लेषण स्पष्ट था- मुस्लिम राजनीति का चरित्र सांप्रदायिक लाभ तक सीमित है। दलितों को साथ तभी रखा जाएगा जब तक उनसे सत्ता और संख्या बल का लाभ मिलता हो। आंबेडकर के अनुसार दलित और मुसलमानों के धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्य इतने भिन्न हैं कि स्थायी सह-अस्तित्व का विचार केवल राजनीतिक कल्पना है, अंततः दलित को काफिर समझकर ही देखा जाएगा। विभाजन के पश्चात जो कुछ घटा, वह आंबेडकर की दूरदर्शी चेतावनी का शब्दशः सत्यापन था।

यहां एक नैतिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी स्पष्ट होना चाहिए। जोगेंद्र नाथ मंडल केवल साक्षी नहीं, किसी सीमा तक सहभागी भी थे। उन्होंने दलितों से कहा कि वे पाकिस्तान के साथ जाएं, उन्होंने शस्त्र उठाने से रोका, उन्होंने मुस्लिम लीग के वचनों पर विश्वास किया और अपने समुदाय को भी उसी विश्वास पर चलाया। इतिहास कठोर है, वह ममता से नहीं, परिणाम से न्याय करता है। मंडल की मंशा दलितों के हित की रही होगी, पर परिणाम दलित समाज के विरुद्ध गया। इस तथ्य का स्वीकार करना अति आवश्यक है, क्योंकि इतिहास से जो सीख न ली जाए, वह फिर विपदा बनकर लौटती है।

आज जब कुछ राजनीतिक गलियारों में “जय भीम जय मीम” का नारा परोसा जा रहा है, तो समझ लेना चाहिए कि यह कोई नवीन विचार नहीं। यह उसी आत्मघाती सोच का पुनरागमन है जिसने 1947 से 1950 के बीच लाखों दलितों को लहूलुहान किया। तब भी यह समीकरण असमान शक्ति संतुलन पर टिका था। नेतृत्व मुस्लिम पक्ष के हाथ था और दलित केवल संख्या पूर्ति कर रहा था। आज भी कुछ दल इस पुरानी रणनीति को नए नाम से प्रस्तुत कर रहे हैं। महाराष्ट्र में अकबरुद्दीन ओवैसी और प्रकाश आंबेडकर की निकटता, उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति द्वारा बार-बार दलित-मुस्लिम गठबंधन का निष्फल प्रयोग, समाजवादी राजनीति का पीडीए सूत्र- ये सब उसी विश्वासघात की ध्वनियां हैं जिनसे इतिहास का रणवाद्य पहले ही गूंज चुका है। दलित अस्मिता का प्रश्न संख्या के व्यापार से कभी नहीं सुलझा, वह शिक्षा, आत्मनिर्भरता, संगठन और सजग राजनीतिक विवेक से ही सुरक्षित होता है।

विभाजन विभीषिका दिवस हमें बताता है कि हम भावनात्मक नारों की ध्वनि में इतिहास की ध्वनि को दबने न दें। अनुसूचित समाज की स्थायी उन्नति परावलम्बन से नहीं, स्वावलम्बन से है, दया दान से नहीं, अधिकार संरचना से है, तुष्टिकरण से नहीं, न्याय सिद्ध शासन से है। जो हाथ इतिहास में हमारे लिए केवल रक्त, राख और रुदन लेकर आए, उनसे सुरक्षा और सम्मान का वरदान नहीं मिलेगा। यह कथ्य आंबेडकर की चेतावनी और मंडल के अनुभव में है। दलित समाज का शाश्वत व्रत होना चाहिए कि हम स्वयं अपनी रक्षा करेंगे, हम अपने विवेक, परिश्रम और संगठन से अपना वर्तमान और भविष्य गढ़ेंगे, हम अपनी आस्था, संस्कृति और परम्परा की रक्षा करते हुए आधुनिक ज्ञान विज्ञान से अपने जीवन को सशक्त करेंगे।

यह भी स्मरण रहे कि इतिहास की त्रुटियां केवल एक पीढ़ी का अपकार नहीं करतीं, वे कई पीढ़ियों के मन में असुरक्षा का बीज बो देती हैं। 1947 से 1950 के बीच पूर्वी पाकिस्तान से पलायन करने वाले पच्चीस लाख शरणार्थियों के आंसू आज भी अनेक परिवारों की स्मृतियों में भरे हैं। गोपालगंज का दिघरकुल, बारीसाल का गौरनाडी, ढाका की अग्नि, कलशिरा की जली हुई बस्तियां- ये केवल स्थान नाम नहीं, ये दलित समाज के अंतर्मन पर अंकित दाग हैं। इन्हें स्मरण करना बदले की संस्कृति नहीं, सुरक्षा के विवेक की साधना है। जो भूलें हमारे पुरखों से हुईं, वही हम फिर क्यों दोहराएं।

अतः आज आवश्यक है कि दलित समाज राजनीतिक निर्णय तथ्य और अनुभव के आधार पर करे, न कि सुगठित नारों के जाल में फंसकर। गठबंधन यदि मूल्यों की समानता और अधिकारों की समान भागीदारी पर न टिके तो वह क्षणिक लाभ दे सकता है, स्थायी सुरक्षा नहीं। मुस्लिम लीग के वचन एक बार सुनकर दलितों ने अपनी भूमि, आजीविका और जीवन का सब कुछ खोया, दूसरी बार वही भूल करना स्वयं पर अन्याय होगा। यह समय आत्मसंयम, आत्मबल और आत्मनिर्णय का है। शिक्षा हमारे लिए शक्ति है, संगठन कवच है, संविधान प्रदत्त अधिकार हमारा अस्त्र है और न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था हमारा आश्रय है। इन्हीं के सहारे दलित समाज अपने लिए सुरक्षित, सम्मानित और समृद्ध भविष्य रच सकता है।

विभाजन विभीषिका का स्मरण केवल आंसू बहाने के लिए नहीं, संकल्प के लिए है। हम यह संकल्प धारण करें कि किसी भी राजनीतिक खेल में दलित अस्मिता को फिर गिरवी न रखा जाएगा, किसी भी संकीर्ण समीकरण में दलित अधिकार फिर सौदे का विषय न बनेंगे, किसी भी धार्मिक कट्टरता के सामने दलित जीवन फिर असहाय न खड़ा होगा। हम अपने बच्चों को इतिहास का सच बताएंगे, ताकि वे नारे सुनें तो साथ ही भीतर से इतिहास की ध्वनि भी सुनें। हम अपने युवकों को बताएंगे कि स्वाभिमान का पथ कठिन होता है पर उसी पर सुरक्षित भविष्य चलता है। हम अपने समाज को संगठित करेंगे, ताकि कोई अनिष्टकारी नेतृत्व हमें फिर भटकाने न पाए।

“वयं रक्षामः” जिसका अर्थ है- “हम रक्षा करते हैं”, अपनों की, अपने संस्कृति एवं परम्परा की और अपने समाज की। यही विभाजन विभीषिका दिवस का सार है, यही आंबेडकर की चेतावनी का मर्म है, यही मंडल के अनुभव की कसक है और यही दलित समाज के सुरक्षित भविष्य की चाबी है। जब तक यह मंत्र हमारे जिह्वा पर और मन में रहेगा, तब तक कोई राजनीतिक छल, कोई सांप्रदायिक उन्माद, कोई अवसरवादी समीकरण हमें भटका नहीं सकेगा। इतिहास की राख पर हम विवेक का दीप जलाएं और आगामी पीढ़ियों को यह धरोहर दें कि उन्होंने एक ऐसे समाज में जन्म लिया जहां स्मृति केवल शोक नहीं, शौर्य का संकल्प भी है, जहां पीड़ा केवल कथा नहीं, परिवर्तन का प्रकाश भी है। यही ऋजु मार्ग है, यही धर्म है, यही नीति है और यही वह संकल्प है जो दलित समाज को अपमान की परछाइयों से निकालकर सम्मान के सूर्य प्रकाश में ले जाएगा।

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