Chhath Puja 2025: छठी मैया व्रत कथा और पूजा विधि और आरती !

Chhath Puja2025: 25 अक्टूबर 2025 से शुरू हो रहा है छठ महापर्व। जानें छठी मैया की पावन व्रत कथा, पूजा का महत्व और सही विधि। इस लेख में पढ़ें संपूर्ण जानकारी।
सनातन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और आस्था के पर्वों में शुमार छठ पूजा का महापर्व इस साल 25 अक्टूबर 2025 से शुरू होकर 28 अक्टूबर को समाप्त होगा। यह पर्व नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य—इन चार दिनों में मनाया जाता है। इस दौरान व्रतधारी सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करते हुए निर्जला व्रत रखते हैं। मान्यता है कि छठ पूजा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र माध्यम है।
हालांकि, छठ पूजा की सार्थकता तभी पूर्ण मानी जाती है जब संध्या अर्घ्य के दौरान छठी मैया की व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाए। इस कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। आइए, जानते हैं छठ पूजा से जुड़ी वह पौराणिक कथा जो इस पर्व के महत्व को और गहराई से समझाती है।
Chhath Puja व्रत कथा: राजा प्रियव्रत और देवसेना का प्रकटीकरण
पौराणिक काल की बात है, प्रियव्रत नामक एक न्यायप्रिय राजा थे। उनकी पत्नी का नाम रानी मालिनी था। राजा और रानी धन-धान्य से संपन्न थे, किंतु संतान न होने के कारण वे सदैव दुखी रहते थे। संतान सुख की प्राप्ति के लिए उन्होंने अनेकों यज्ञ और उपाय किए, परंतु हर बार निराशा ही हाथ लगी।
एक दिन, निराश होकर राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी महर्षि कश्यप के आश्रम में पहुंचे। उनकी व्यथा सुनकर महर्षि ने एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में आहुति के लिए बनी खीर का प्रसाद यज्ञ के बाद रानी मालिनी को दिया गया। प्रसाद ग्रहण करने के पश्चात रानी गर्भवती हो गईं, किंतु समय आने पर उन्होंने एक मृत पुत्र को जन्म दिया। यह देख राजा-रानी का दुख सागर छलक उठा।
अपने मृत पुत्र के शव को लेकर राजा प्रियव्रत श्मशान पहुंचे और आत्महत्या का विचार करने लगे। तभी अचानक आकाश से प्रकाश फूट पड़ा और एक दिव्य देवी प्रकट हुईं।
देवी ने स्वयं का परिचय देते हुए कहा, “हे राजन! मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हूं। सृष्टि के छठे अंश से मेरी उत्पत्ति हुई है, इसीलिए मुझे षष्ठी या छठी मैया कहा जाता है। तुम्हें अपने प्राणों का त्याग क्यों करना चाहते हो?”
राजा ने दुखी मन से अपनी संतानहीनता और मृत पुत्र की कहानी सुनाई। तब देवी बोलीं, “सृष्टि के आरंभ में मेरी ही पूजा का विधान था, जो अब लुप्त हो गया है। यदि तुम मेरी पूजा विधि-विधान से करोगे और संसार में इसे प्रचारित करोगे, तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न का वरदान देती हूं।”
देवी के आदेशानुसार, राजा प्रियव्रत ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को विधिपूर्वक व्रत रखा और छठी मैया की पूजा की। इसके फलस्वरूप उन्हें एक तेजस्वी और स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से संसार में छठ मैया की पूजा और इस व्रत की परंपरा का प्रचलन आरंभ हुआ।
Chhath Puja कथा का महत्व और आधुनिक संदर्भ
यह कथा न केवल आस्था को दर्शाती है, बल्कि यह भी संदेश देती है कि निराशा के क्षणों में भी धैर्य और सच्ची श्रद्धा से किया गया उपासना फलित अवश्य होती है। आज भी लाखों लोग इसी आस्था और विश्वास के साथ छठी मैया का व्रत रखते हैं और सूर्य देव को अर्घ्य देकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
साल 2025 में यह पर्व 25 अक्टूबर से आरंभ होकर 28 अक्टूबर को उषा अर्घ्य के साथ संपन्न होगा। सभी भक्तों को छठ महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
Chhathi Maiya Ki Aarti Lyrics In Hindi
जय छठी मैया ऊ जे केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए ॥जय॥
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय ॥जय॥
अमरुदवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए ॥जय॥
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
शरीफवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मंडराए ॥जय॥
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय ॥जय॥
ऊ जे सेववा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए ॥जय॥
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
सभे फलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मंडराए ॥जय॥
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय ॥जय॥
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