Teacher’s Day 2025: गुरु का आशीर्वाद और Powerful Lessons जिन्होंने बदली लाखों की जिंदगी

Teacher’s Day 2025: जानिए क्यों शिक्षक कहलाते हैं Nation Builders, उनकी अहमियत, भावनात्मक कहानियां और समाज पर उनके अमिट योगदान की पूरी कहानी।
लखनऊ 04 सितम्बर, 2025: Teachers किसी भी समाज की रीढ़ की हड्डी होते हैं। माता-पिता के बाद अगर किसी का सबसे बड़ा योगदान हमारे जीवन को दिशा देने में होता है, तो वह हमारे गुरु होते हैं। भारत में 5 सितंबर सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भावनाओं का पर्व है। Teacher’s Day उन गुरुओं को समर्पित है, जिन्होंने हमें किताबों से आगे बढ़कर जीवन जीने की कला सिखाई। Teacher’s Day वह दिन है जब हम सभी अपने Teachers को याद करते हैं—वो शिक्षक जिन्होंने हमारी कापी पर लाल पेन से लिखी छोटी-सी तारीफ से हमारे सपनों को पंख दिए, और कभी डांट-डपट से हमारी दिशा सुधारी।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन: एक शिक्षक जो खुद बने प्रेरणा

5 सितंबर 1888 को जन्मे डॉ. राधाकृष्णन ने अपने जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षण को समर्पित किया। वे सिर्फ किताबें पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने छात्रों को यह सिखाया कि शिक्षा का असली मतलब जीवन जीना और इंसान बनना है।
कहा जाता है कि जब उनके छात्र और मित्र उनका जन्मदिन मनाना चाहते थे, तो उन्होंने नम्रता से कहा:
“मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाइए। इससे मुझे अधिक गर्व होगा।”
क्या कोई कल्पना कर सकता है कि एक राष्ट्रपति, जिसके लिए पूरा देश जश्न मना सकता था, उसने अपना दिन पूरे शिक्षक समाज को समर्पित कर दिया? यही एक सच्चे शिक्षक की महानता है।
Teacher’s Day क्यों हैं खास?
हमारे जीवन में माता-पिता के बाद यदि किसी का सबसे बड़ा स्थान है, तो वह शिक्षक का है।
- वही हमें पहली बार पेंसिल पकड़ना सिखाते हैं।
- वही हमें कठिन सवालों से जूझना और उनसे हार न मानना सिखाते हैं।
- और वही हमारे अंदर छुपी हुई संभावनाओं को पहचान कर उन्हें चमकाते हैं।
एक छात्र की सफलता के पीछे अक्सर उसकी मेहनत के साथ-साथ एक ऐसे शिक्षक की कहानी होती है, जिसने उसे विश्वास दिलाया—
“तुम कर सकते हो।”
भारत और दुनिया में Teacher’s Day
दुनिया में World Teacher’s Day 5 अक्टूबर को मनाया जाता है, लेकिन भारत ने अपने महान शिक्षक डॉ. राधाकृष्णन की इच्छा का सम्मान करते हुए 5 सितंबर को ही Teacher’s Day मनाने का दिन चुना।
यह फैसला केवल तारीख का चुनाव नहीं था, बल्कि यह हमारे देश की गुरु-शिष्य परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
भावुक कहानियाँ जो दिल छू लें
1. सुरेश चालागोरी – पहाड़ चढ़कर शिक्षा की मशाल

- चालागोरी जी कर्नाटक के गडग जिले में रहते हैं। उनका स्कूल बैरापुर गांव के पहाड़ पर स्थित है।
- पिछले 8 सालों से वे रोज़ पहाड़ चढ़कर बच्चों को पढ़ाने जाते हैं।
- कभी उन्हें किताबें, स्टेशनरी और मिड-डे-मील का राशन भी खुद ढोकर ले जाना पड़ता है।
- सोचिए, जहां बहुत से लोग आरामदायक नौकरी ढूँढते हैं, वहीं वे बच्चों को शिक्षा देने के लिए कठिन जीवनशैली अपनाते हैं।
यह कहानी बताती है कि सच्चा शिक्षक हर बाधा पार कर शिक्षा की रोशनी फैलाता है।
2. आनंद कुमार (सुपर 30) – गरीब बच्चों का सपना साकार

- पटना के आनंद कुमार का जीवन संघर्षों से भरा था। पिता की मृत्यु और गरीबी ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय जाने से रोक दिया।
- उन्होंने पापड़ बेचकर घर चलाया और साथ में बच्चों को गणित पढ़ाना शुरू किया।
- फिर उन्होंने सुपर 30 की शुरुआत की, जहां वे हर साल 30 गरीब छात्रों को मुफ्त में IIT की कोचिंग देते हैं।
- परिणाम: लगभग हर साल उनके छात्र IIT में प्रवेश पाते हैं।
यह कहानी दिखाती है कि शिक्षक केवल पढ़ाते नहीं, बल्कि छात्रों को उनकी मंज़िल तक पहुँचने का रास्ता भी दिखाते हैं।
3. अवनीश यादव – जब पूरा गांव रो पड़ा

- गाजीपुर जिले के अवनीश यादव की तैनाती देवरिया जिले के एक पिछड़े गांव में हुई।
- वहाँ बच्चे स्कूल जाने की बजाय खेतों और मजदूरी में लगे रहते थे।
- अवनीश जी ने घर-घर जाकर लोगों को शिक्षा का महत्व समझाया।
- धीरे-धीरे बच्चों की संख्या इतनी बढ़ गई कि सरकारी स्कूलों ने कॉन्वेंट स्कूलों को पीछे छोड़ दिया।
- लेकिन जब उनका ट्रांसफर हुआ, तो विदाई पर पूरा गांव और सभी छात्र रो पड़े।
यह कहानी साबित करती है कि शिक्षक सिर्फ कक्षा में नहीं, बल्कि समुदाय के दिलों में भी जगह बना लेते हैं।
4. संदीप राजपूत – नौकरी छोड़ बनाई नई राह

- संदीप राजपूत पहले एक निजी कंपनी में अधिकारी थे।
- रोज़ाना सफर के दौरान उन्होंने सड़कों पर झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों को देखा।
- उन बच्चों की हालत देखकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी और उन्हें पढ़ाने का प्रण लिया।
- उन्होंने मोबाइल स्कूल की शुरुआत की, जो अब 2000 से ज़्यादा मजदूरों और गरीब बच्चों को शिक्षा दे रहा है।
यह कहानी हमें दिखाती है कि शिक्षक होना पद से नहीं, बल्कि सेवा के भाव से तय होता है।
5. हुकुम सिंह – अपने दम पर अनाथ बच्चों का सहारा

- देहरादून के हुकुम सिंह एक सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक हैं।
- जब उनका स्कूल बंद होने की कगार पर था, तो उन्होंने अपने वेतन और समाज के सहयोग से इसे बचाया।
- अब यह स्कूल अनाथ और गरीब बच्चों का आश्रय है, जहां 160 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं।
उनकी कहानी दिखाती है कि एक शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को सरकारी तंत्र तक सीमित नहीं रखता।
समापन भाव
इन सभी कहानियों का सार यही है कि Teacher सिर्फ नौकरी करने वाला इंसान नहीं, बल्कि समाज को बदलने वाला दीपक है।
- सुरेश चालागोरी संघर्ष की मिसाल हैं।
- आनंद कुमार सपनों को सच करने वाले गुरु हैं।
- अवनीश यादव समुदाय के दिलों में बसे शिक्षक हैं।
- संदीप राजपूत सेवा भावना के प्रतीक हैं।
- और हुकुम सिंह त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति हैं।
इन कहानियों से हमें यह सीख मिलती है कि एक सच्चा शिक्षक समाज का सबसे बड़ा परिवर्तनकारी एजेंट होता है।
Teacher’s day सिर्फ स्कूल और कॉलेज तक सीमित नहीं हैं। वे समाज के हर कोने में ज्ञान और संस्कार की रोशनी फैला रहे हैं। चाहे वो पहाड़ पर चढ़ने वाले सुरेश चालागोरी हों, Super 30 के आनंद कुमार हों या गांव के बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले हुकुम सिंह – ये सब दिखाते हैं कि असली शिक्षक वही हैं, जो हर दिन समाज को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।
Teacher’s Day 2025 केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि यह दिन हमें याद दिलाता है कि Teachers ही असली Nation Builders हैं। उनके बिना कोई भी समाज अपनी जड़ों से मजबूत नहीं हो सकता।
आज जब तकनीक और डिजिटल शिक्षा का दौर है, तब भी एक सच्चे गुरु का महत्व कम नहीं हुआ। Online classes, AI और Modern Tools भले ही शिक्षा को आसान बना रहे हों, लेकिन शिक्षक का मार्गदर्शन ही छात्र को सही दिशा देता है। Teacher’s Day हमें यही सोचने पर मजबूर करता है कि तकनीक कभी भी इंसान की भावनाओं और मार्गदर्शन की जगह नहीं ले सकती। Teacher’s Day हमें यह भी याद दिलाता है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है, और समाज का भविष्य अधर में लटका रह सकता है।
डॉ. राधाकृष्णन ने सही कहा था कि शिक्षक का महत्व एक दिन से नहीं मापा जा सकता। असल में, हर दिन Teacher’s Day होना चाहिए।
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