
परिवर्तिनी एकादशी 2025: जानिए इस व्रत की तिथि, पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा। विष्णु भगवान की आराधना से मिलते हैं विशेष पुण्यफल और मोक्ष की प्राप्ति।
लखनऊ 02 सितम्बर, 2025: सनातन धर्म में हर एकादशी तिथि को पापों के नाश, मोक्ष की प्राप्ति और आत्मशुद्धि का मार्ग माना गया है। विशेषकर परिवर्तिनी एकादशी का महत्व अत्यंत गहरा है, क्योंकि यह दिन स्वयं भगवान विष्णु की योगनिद्रा के मध्य करवट बदलने का प्रतीक है। इसे व्रतीजनों के लिए ऐसा दिव्य अवसर बताया गया है, जब साधक को अपने जीवन की दिशा बदलने, संकल्प दृढ़ करने और प्रभु भक्ति में स्वयं को समर्पित करने का वरदान प्राप्त होता है।
इस एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा होती है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की इस पावन परिवर्तिनी एकादशी को व्रत करने से मनुष्य के समस्त दुख दूर होते हैं और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन किया गया जप, तप और दान कई गुना फलदायी होता है। यही कारण है कि इसे “पद्मा”, “जलझूलनी”, “पार्श्व” एकादशी और वामन जयंती के नामों से भी पुकारा जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी क्यों खास है?
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं।
इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी का महत्व यह है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में करवट बदलते हैं। यह करवट बदलना ही “परिवर्तन” कहलाता है, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। एक मान्यता के अनुसार इस दिन माता यशोदा ने जलाशय पर जाकर श्री कृष्ण के वस्त्र धोए थे,इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है।
तिथि और मुहूर्त (2025)
- एकादशी व्रत की शुरुआत– 3 सितंबर 2025, प्रातः 3:53 बजे
- एकादशी व्रत की समाप्ति – 4 सितंबर 2025, प्रातः 4:21 बजे
- व्रत पारण (पराना) का समय – 4 सितंबर 2025, दोपहर 1:36 से 4:07 बजे के बीच
शास्त्रों के अनुसार पारण का समय बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। निर्धारित समय से पहले या बाद में व्रत खोलना अनुचित माना जाता है।
पूजा विधि और नियम
परिवर्तिनी एकादशी व्रत के दौरान साधक को विशेष नियमों का पालन करना होता है:
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- घर या मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- तुलसी पत्र, पीत वस्त्र और पीली मिठाई से भगवान का पूजन करें।
- इस दिन व्रती को सात्विक आहार ही ग्रहण करना चाहिए और रातभर जागरण कर विष्णु सहस्त्रनाम या गीता पाठ करना चाहिए।
- एकादशी पर चावल और तामसिक भोजन का सेवन वर्जित माना गया है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

वामन अवतार और बलि की कथा विस्तार से
त्रेता युग में, असुरों के महान और दानवीर राजा महाबली (बलि) ने अपनी तपस्या, पराक्रम और बल के बल पर तीनों लोकों – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल – पर अधिकार कर लिया। उनकी शक्ति इतनी प्रबल थी कि देवताओं का स्वर्गलोक छिन गया और इंद्रदेव सहित सभी देवता निराश होकर धरती पर भटकने लगे।
देवगण विष्णु भगवान के शरण में पहुँचे और प्रार्थना करने लगे –
“हे नारायण! आप ही हमारी रक्षा करें। बलि ने अत्याचार नहीं किया, परंतु उसकी अपार शक्ति और महत्वाकांक्षा के कारण ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ गया है। यदि यह स्थिति बनी रही तो त्रिलोक व्यवस्था नष्ट हो जाएगी।”
भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले –
“बलि दानवीर है, अतः उसे बल से नहीं, बुद्धि से हराना उचित होगा।”
वामन अवतार का जन्म
इसके बाद भगवान विष्णु ने ऋषि कश्यप और अदिति के घर जन्म लिया। अदिति ने देवताओं की सहायता के लिए घोर तप किया था। विष्णु ने उनके गर्भ से एक वामन (बौने ब्राह्मण) रूप में अवतार लिया।
छोटे-से, तेजस्वी बालक वामन ने यज्ञोपवीत धारण किया और कमंडलु, छड़ी और छत्र (छाता) के साथ बलि के यज्ञ स्थल पर पहुँचे।
बलि से दान का वरदान

राजा बलि उस समय विशाल अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि एक तेजस्वी ब्राह्मण बालक यज्ञ मंडप में आया है, तो वह उठ खड़े हुए और बड़े सम्मान से उसका स्वागत किया।
बलि ने कहा –
“हे ब्राह्मण! आप धन, भूमि, गाय, स्वर्ण – जो भी चाहें, मुझसे माँग लें।”
वामन ने नम्रता से कहा –
“महाराज! मुझे आपसे केवल तीन पग भूमि चाहिए।”
बलि हँस पड़े और बोले –
“हे बालक! तुम माँगना जानते ही नहीं। मैं पूरी पृथ्वी देने को तैयार हूँ और तुम मात्र तीन पग भूमि माँगते हो?”
लेकिन वामन ने आग्रह किया कि उन्हें केवल तीन पग भूमि चाहिए।
वामन का विराट रूप
दान देने का संकल्प पूरा करने के लिए जैसे ही बलि ने जल अर्पण किया, वामन ने अचानक अपना रूप बदल लिया। वह बढ़ते-बढ़ते विराट स्वरूप धारण कर ब्रह्मांड को ढकने लगे।
- पहले पग में उन्होंने पृथ्वी नाप ली।
- दूसरे पग में स्वर्ग लोक।
अब तीसरे पग के लिए स्थान ही नहीं बचा।
बलि का समर्पण

भगवान वामन ने पूछा –
“राजन! अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?”
तब दानवीर बलि ने विनम्रता से कहा –
“भगवान! अब मेरे पास देने को कुछ नहीं बचा। आप चाहें तो अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।”
भगवान ने प्रसन्न होकर तीसरा पग बलि के सिर पर रखा और उसे पाताल लोक भेज दिया। परंतु उनकी भक्ति, दानशीलता और समर्पण भाव से प्रसन्न होकर विष्णु ने बलि को वरदान दिया कि –
- वह पाताल लोक का राजा रहेगा।
- हर वर्ष कार्तिक मास में एक बार उसे पृथ्वी पर अपने प्रजाजनों से मिलने का अवसर मिलेगा।
इस कथा का महत्व
इस कथा का संदेश है कि अहंकार चाहे दैत्य हो या देवता, उसे सदैव विनम्रता से संतुलित किया जाना चाहिए।
व्रत और कथा सुनने से व्रती को मोक्ष का मार्ग, धन-वैभव, ऐश्वर्य और देवताओं का आशीर्वाद मिलता है
आध्यात्मिक संदेश

परिवर्तिनी एकादशी केवल पूजा-व्रत का दिन नहीं है, बल्कि यह आंतरिक परिवर्तन का प्रतीक है।
जैसे भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, वैसे ही साधक को भी अपने जीवन की दिशा धर्म, भक्ति और सत्कर्म की ओर मोड़नी चाहिए।
यह तिथि साधक को “स्वयं का पुनर्जन्म” करने का अवसर देती है।
परिवर्तिनी एकादशी 2025 राशिनुसार पर करें ये उपाय–
मेष- मेष राशि के लोग इस दिन ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें.
वृषभ- वृष राशि के लोग मिश्री का भोग लगाएं.
मिथुन- मिथुन राशि के लिए घी का दीप जलाएं.
कर्क- कर्क राशि वाले चावल-दही और चांदी का दान करें.
सिंह- सिंह राशि वाले चंदन से पूजा करें.
कन्या- कन्या राशि के लिए तुलसी पत्र और रक्त चंदन जरूरी है.
तुला- तुला राशि के लोग खीर चढ़ाएं.
वृश्चिक- वृश्चिक राशि वाले ‘तप रूपाय विद्महे..’ मंत्र का जाप करें.
धनु- धनु राशि वाले फलाहार खाएं.
मकर- मकर राशि वालों को कांसे के दीपक से पूजा करनी चाहिए.
कुंभ- कुंभ राशि वालों को भी घी का दीपक जलाना उचित है.
मीन- मीन राशि वाले दान-धर्म का कार्य करें.
“परिवर्तिनी एकादशी” न केवल भगवान विष्णु के वामन रूप की स्मृति है, बल्कि यह आत्मिक परिवर्तन, पापों से मुक्ति, और सर्वोच्च आध्यात्मिक आशीर्वाद का अवसर भी प्रदान करता है। 2025 में परिवर्तिनी एकादशी व्रत 03 सितंबर को रखा जाएगा, जिसे श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाकर जीवन को शुभता और उन्नति की ओर अग्रसर किया जा सकता है।
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