Divine Story: Ganesh Chaturthi 2025 पर जानें गणेशजी के प्राकट्य की अद्भुत कथा: जन्म, रहस्य और भक्तिभाव

जानिए भगवान गणेशजी के जन्म की दिव्य कथा और गणेश चालीसा का महत्व। कैसे माता पार्वती के तप और शिव की कृपा से गणपति बाल स्वरूप में प्रकट हुए। पढ़ें पूरी कहानी, भक्ति और महिमा।
लखनऊ 27 अगस्त 2025: आज से पूरे भारतवर्ष में गणेश चतुर्थी की शुरुआत हो रही है। हर गली, हर चौक, हर मंदिर में ढोल-ताशों की गूंज है और “गणपति बप्पा मोरया” के जयकारे आकाश में घुल गए हैं। मोदक का प्रसाद बंट रहा है और जगह-जगह सजे पंडालों में गणेशजी का स्वागत किया जा रहा है।
बीस साल पहले तक उत्तर भारत में यह पर्व केवल महिलाओं के व्रत तक सीमित था, लेकिन आज यह आयोजन महाराष्ट्र की परंपरा से निकलकर पूरे देश का उत्सव बन गया है। सवाल यह उठता है—क्या हम वास्तव में गणेशजी का “जन्मदिवस” मना रहे हैं, या यह उनके “प्राकट्य” का उत्सव है?
बालरूप देवताओं की परंपरा
भारतीय समाज में बालरूप देवताओं की पूजा का गहरा स्थान है।
- श्रीकृष्ण को बालक रूप में लड्डू गोपाल, माखनचोर और यशोदानंदन के रूप में पूजा जाता है।
- वहीं गणेशजी का बालरूप भी भक्तों के हृदय में बसता है।
दिल्ली का प्रसिद्ध उत्तरागुरुवायुर अप्पन मंदिर, जो केरल के त्रिशूर स्थित असली मंदिर की प्रतिकृति है, इस परंपरा का उदाहरण है। यहां जहां बालकृष्ण की पूजा होती है, वहीं एक दिशा में बालरूप गणेशज भी विराजमान हैं।
भाईयों का संगम: कार्तिकेय और गणेशजी

दक्षिण भारत में गणेशज की पूजा उनके बड़े भाई कार्तिकेय (मुरुगन) के साथ जुड़ी हुई है।
- कार्तिकेय गंभीर, सेनापति और मर्यादित स्वरूप के देवता हैं।
- गणेश नटखट, चंचल और मां के लाडले माने जाते हैं।
बिलकुल वैसे ही जैसे किसी भारतीय परिवार में बड़ा भाई पिता का अनुशासन बन जाता है और छोटा भाई मां का लाड़ला। यही छवि हमें बलराम-श्रीकृष्ण और कार्तिकेय-गणेशजी में दिखती है।
क्या गणेश चतुर्थी गणेशजी का जन्मोत्सव है?
जैसे जन्माष्टमी पर हम श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व मनाते हैं, वैसे ही भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश का प्राकट्य माना जाता है। लेकिन यहां “जन्म” शब्द उतना सटीक नहीं है।
गणेशजी को जन्म से अधिक “प्राकट्य” कहा गया है, क्योंकि वे अनादि हैं। यही कारण है कि तुलसीदास ने रामचरितमानस में भी “भए प्रगट कृपाला…” लिखकर अवतारों को जन्म नहीं बल्कि प्राकट्य कहा है।
रामचरितमानस में गणेशजी का उल्लेख
बालकांड का 100वां दोहा इस रहस्य को उजागर करता है:
“मुनि अनुसासन गणपतिहि पूजेउ संभु भवानी।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जिय जानि।।”
(अर्थ: मुनियों के कहने पर शिव-पार्वती ने गणेशजी की पूजा की। संशय न करो क्योंकि गणेशजी अनादि हैं।)
यहां से स्पष्ट है कि गणेशजी का अस्तित्व माता-पिता से भी पहले से माना गया है।
गणेश पुराण में गणेशजी का स्वरूप

गणेश पुराण में वर्णन आता है कि—
- अक्षरों में सबसे पहले “ॐ” का उच्चारण हुआ।
- यही प्रणव (ॐ) जब साकार हुआ तो गणेशजी प्रकट हुए।
- इसलिए वे प्रथमेश कहलाए और हर शुभ कार्य की शुरुआत उनसे ही होती है।
चार युग और गणेशजी का प्राकट्य
गणेशजी ने हर युग में अलग रूप धारण किया—
- सत्ययुग – विनायक, दस भुजाओं के साथ, सिंह पर सवार।
- त्रेतायुग – मयूरेश्वर, छह भुजाओं के साथ, मयूर पर आरूढ़।
- द्वापरयुग – गजानन, लाल वर्ण, चूहे पर सवार। यहीं वे शिव-पार्वती के पुत्र बने।
- कलियुग – धूम्रकेतु, धुएं के रंग के साथ, घोड़े पर सवार।
यानी द्वापरयुग से ही उन्हें “गजानन” कहा जाने लगा।
पार्वतीजी और उबटन की कथा

सबसे प्रसिद्ध कथा यह है कि—
- पार्वतीजी ने अपने हल्दी उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाई।
- उस मूर्ति से बालक जीवित हुआ और विनायक कहलाया।
- देवताओं ने पुष्पवर्षा की और पार्वती ने उसे पुत्र रूप में अपनाया।
इसलिए हर देवी प्रतिमा के साथ गणेशजी की मूर्ति भी स्थापित की जाती है।
गणेश चालीसा से कथा
गणेशजी के प्राकट्य का सबसे सुंदर वर्णन गणेश चालीसा में मिलता है।
एक समय गिरिराज कुमारी।पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा॥
अतिथि जानी के गौरी सुखारी।बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा।मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना।पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कही अन्तर्धान रूप हवै।पालना पर बालक स्वरूप हवै॥
बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना।लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना॥
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥
इन चौपाइयों से साफ है कि पार्वतीजी के तप से स्वयं ब्रह्मांड नायक गणेशजी बालक रूप में प्रकट हुए।
गणेशजी का शीश कैसे कटा?

यह हिस्सा वास्तव में गणेशजी की सबसे प्रसिद्ध जन्मकथाओं में से एक का सार है। मैं आपको इसे विस्तार से कहानी की शैली में समझाता हूँ:
देवताओं और ऋषियों के आमंत्रण पर जब सभी कैलाश पर भगवान गणेशजी के जन्मोत्सव में आए, तो हर कोई नवजात बालक के दर्शन करना चाहता था। उसी समय शनि देव भी वहां पहुँचे।
अब कथा यह है कि शनि देव की दृष्टि दोष बहुत प्रबल मानी जाती है। स्वयं उनकी पत्नी ने उन्हें श्राप दिया था कि जिसकी ओर वे सीधे दृष्टि डालेंगे, उसका नाश हो जाएगा। इस कारण शनि जी सदैव दृष्टि झुकाकर रहते थे।
माता पार्वती ने जब देखा कि शनि देव अपने नेत्र नीची ओर किए बैठे हैं, तो उन्होंने आग्रह किया –
“शनि देव! आप भी मेरे पुत्र का मुख दर्शन कीजिए, आखिर यह तो एक महोत्सव का समय है।”
शनि देव ने हाथ जोड़कर निवेदन किया –
“माता! मेरी दृष्टि दोषपूर्ण है। यदि मैंने बालक की ओर सीधा देखा, तो अनर्थ हो सकता है।”
लेकिन पार्वती जी के बार-बार आग्रह करने पर शनि देव ने एक झलक देखने की चेष्टा की।
जैसे ही उनकी तिरछी दृष्टि बालक गणेश पर पड़ी, उसी क्षण गणेशजी का सिर धड़ से अलग हो गया।
पूरा वातावरण शोक से भर गया। माता पार्वती हाहाकार करने लगीं और जोर-जोर से रोने लगीं। उनका करुण विलाप सुनकर सारा कैलाश कांप उठा।
तब भगवान शिव ने तुरंत आदेश दिया कि उत्तर दिशा की ओर जाकर जिस प्राणी का सिर सबसे पहले मिले, वही लेकर आओ। गण, रुद्र और नंदी तुरंत दौड़े और उन्हें एक गज (हाथी) का सिर मिला। वे उसे लेकर आए।
शिवजी ने वह गजशीष गणेश के धड़ पर स्थापित कर दिया और प्राण प्रतिष्ठा की।
इस प्रकार बालक को नया जीवन मिला।
तभी सभी देवताओं ने एक स्वर से घोषणा की –
“आज से यह बालक देवताओं में अग्रणी होगा। सभी कार्यों में इसकी पूजा सबसे पहले होगी।”
और उसी समय से वे कहलाए —
गजानन, विनायक, विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य श्री गणेश।
अन्य जन्म कथाएं

- सतयुग में महोत्कट अवतार – यहाँ यह बताया गया है कि सतयुग में गणेशजी ने महोत्कट रूप धारण किया और कश्यप व अदिति के पुत्र बने। इस अवतार में उनका उद्देश्य असुरों का संहार करना था। विशेष रूप से देवांतक और नरांतक नामक दो शक्तिशाली असुरों को उन्होंने परास्त किया। इसका तात्पर्य यह है कि गणेशजी केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि दुष्ट शक्तियों के संहारक भी हैं।
- लिंग पुराण की कथा – इस कथा के अनुसार भगवान शिव ने पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से गणेशजी को उत्पन्न किया। इसलिए गणेशजी का संबंध केवल पार्वतीजी की सृष्टि से नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल तत्वों से भी है। इसी कारण उन्हें मूलाधार चक्र का स्वामी कहा गया है। योगशास्त्र में मूलाधार चक्र ही मनुष्य की आध्यात्मिक ऊर्जा का आधार माना जाता है, और वहीं से साधना की शुरुआत होती है।
मतलब यह कि ये दोनों कथाएं गणेशजी की बहुआयामी उत्पत्ति को दर्शाती हैं —
- कभी वे दैवीय संहारक के रूप में आते हैं (महोत्कट अवतार)।
- कभी वे सृष्टि के पंचतत्वों से जुड़े आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में प्रकट होते हैं।
गणेशजी का जीवन दर्शन
गणेशजी की सभी कथाएं हमें जीवन का सार सिखाती हैं।
- वे बुद्धि और चतुराई के देवता हैं।
- वे शुभ और लाभ के प्रतीक हैं।
- वे बताते हैं कि अनुशासन और चंचलता, दोनों का संतुलन जीवन में जरूरी है।
आज जब हम गणेश चतुर्थी मना रहे हैं, तो यह केवल पूजा का पर्व नहीं बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है।
गणेशजी हमें यह संदेश देते हैं—
- हर कार्य से पहले उन्हें स्मरण करना चाहिए।
- अपने भीतर के विकारों को हटाकर शुभ मार्ग अपनाना चाहिए।
- बुद्धि और भक्ति का संतुलन बनाकर जीवन जीना चाहिए।
अगर हम ऐसा करें, तो हर व्यक्ति के भीतर गणेशजी प्रकट हो सकते हैं। और तभी यह पर्व अपने वास्तविक अर्थ में सार्थक होगा।
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