
Assam सरकार ने निजी अस्पतालों पर कसा शिकंजा, अब इलाज का बिल बाकी होने पर भी 2 घंटे में शव परिजनों को सौंपना होगा। जानिए ऐसे ही 5 चौंकाने वाले मामले।
लखनऊ, 11 जुलाई 2025: Assam के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सरकार ने एक मानवीय और संवेदनशील फैसला लिया है, जो देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। अब राज्य में कोई भी निजी अस्पताल किसी मृतक का शव केवल इसलिए रोक नहीं सकेगा क्योंकि उसका इलाज का बिल बकाया है।
Assam सरकार ने साफ निर्देश जारी करते हुए कहा है कि मौत की पुष्टि के दो घंटे के भीतर अस्पतालों को शव परिजनों को सौंपना अनिवार्य होगा। यदि कोई निजी अस्पताल इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब बीते वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों से निजी अस्पतालों की संवेदनहीनता के मामले सामने आए हैं। कई बार अस्पतालों ने बकाया बिल न चुकाने पर परिजनों को मृत शरीर सौंपने से इनकार कर दिया, जिससे पीड़ित परिवारों को भारी मानसिक और आर्थिक यातना का सामना करना पड़ा।
जानिए देश के 5 ऐसे चौंकाने वाले मामले, जिन्होंने मानवता को झकझोर दिया
पीलीभीत, उत्तर प्रदेश (फरवरी 2024)
एक निजी अस्पताल ने एक गरीब व्यक्ति की मौत के बाद उसका शव इसलिए नहीं सौंपा क्योंकि परिवार बिल का भुगतान नहीं कर सका था। परिजनों ने आयुष्मान कार्ड दिखाया, मिन्नतें की, लेकिन अस्पताल नहीं माना। मजबूर होकर बेटे ने चंदा इकट्ठा किया और पैसे चुकाए। यह मामला सामने आने के बाद CMO ने जांच टीम गठित की।
द्वारका, दिल्ली (2024)
राजधानी के एक निजी अस्पताल ने एक बुजुर्ग महिला के शव को कई दिन तक रोके रखा, क्योंकि बिल का भुगतान नहीं हुआ था। परिवार ने इलाज में लापरवाही और अमानवीयता का आरोप लगाया। घटना ने NCR में निजी अस्पतालों की नैतिकता पर सवाल खड़े कर दिए।
गुजरात (2021, कोविड काल)
कोरोना महामारी के दौरान एक निजी अस्पताल ने मृतक का शव देने से इनकार कर दिया क्योंकि परिवार बिल नहीं चुका सका। इतना ही नहीं, अस्पताल ने परिवार की कार तक जब्त कर ली। यह मामला सामने आने पर पूरे देश में अस्पतालों की नीतियों पर बहस शुरू हो गई।
हैदराबाद, तेलंगाना (2019)
यह मामला और भी हृदयविदारक था। एक नवजात शिशु की मृत्यु के बाद एक निजी अस्पताल ने परिजनों से पूरी फीस वसूली के बाद ही शव सौंपा। मीडिया और पुलिस के हस्तक्षेप से शव दिलाया गया, लेकिन इसने चिकित्सा नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
बेंगलुरु, कर्नाटक (2020)
कोरोना काल में एक मरीज की मृत्यु के बाद अस्पताल ने बिल बकाया होने के कारण शव रोक लिया। परिजनों ने आरोप लगाया कि अस्पताल ने रातोंरात पैसे जुटाने के लिए दबाव डाला। मामला राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध और नीति बदलाव की मांग का कारण बना।
Assam सरकार का सख्त निर्देश: दो घंटे के भीतर शव सौंपना अनिवार्य
Assam के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बयान में कहा –
“अब कोई भी निजी अस्पताल मरीज के शव को केवल इसलिए नहीं रोक सकता कि उसका इलाज का भुगतान बाकी है। मानवता से बढ़कर कुछ नहीं।”
सरकार के आदेश के मुताबिक:
- मौत की पुष्टि होते ही दो घंटे के भीतर शव परिजनों को सौंपना होगा।
- बकाया बिल को लेकर शव रोकना अपराध माना जाएगा।
- नियम का उल्लंघन करने पर प्रशासन सख्त कार्रवाई करेगा।
यह निर्णय ना सिर्फ Assam बल्कि पूरे भारत के लिए एक नीति मार्गदर्शक बन सकता है। यह मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देने की ओर एक साहसी कदम है।
अस्पतालों की नीति पर सवाल: संवेदनहीनता बनाम संवेदनशीलता
भारत में स्वास्थ्य सेवाएं निजी हाथों में होने के कारण कई बार आर्थिक शोषण की शिकायतें सामने आती रही हैं। मरीज की मौत के बाद भी अस्पताल फीस वसूली के लिए शव को बंधक बना लेते हैं, जो न सिर्फ अमानवीय है बल्कि गैरकानूनी भी होना चाहिए।
Assam सरकार का यह फैसला ऐसे अमानवीय कृत्यों पर रोक लगाने का उदाहरण बन सकता है। यह बाकी राज्यों को भी इसी दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है।
Assam सरकार का यह फैसला ना केवल एक प्रशासनिक निर्णय है, बल्कि यह मानवता और नैतिकता की जीत है। जब निजी अस्पताल इलाज के बाद भी लाभ के लिए पीड़ित परिजनों को प्रताड़ित करते हैं, तब ऐसी नीति-निर्माण की अहमियत और भी बढ़ जाती है।
अब आवश्यकता है कि यह नीति पूरे देश में लागू हो, ताकि कोई भी परिवार मृत्यु के बाद भी अपनों का सम्मानजनक विदाई न दे पाने की पीड़ा से न गुजरे।
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